प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा जनता के सामने विकास के बड़े-बड़े दावे और आकर्षक “जाहिरनामा” पेश किए जाते हैं। वर्ष 2025 के चुनावी माहौल में भी सत्ता पक्ष द्वारा जारी किए गए जाहिरनामे में कुल 37 आकर्षक मुद्दे प्रकाशित किए गए थे। उसी में 10वें क्रमांक पर “शहरात नाट्यगृहाची निर्मिती केल्या जाईल” अर्थात शहर में नाट्यगृह निर्माण का वादा किया गया था।
लेकिन चुनावी शोर शांत होने के बाद अब जनता सवाल पूछ रही है कि आखिर यह वादा जमीन पर कब उतरेगा? या फिर यह भी सिर्फ वोट लेने तक सीमित एक राजनीतिक जुमला साबित होगा?
घुग्घुस नगर परिषद क्षेत्र के 11 प्रभागों में रहने वाले हजारों परिवारों के बच्चे और युवक-युवतियां हर वर्ष विभिन्न त्योहारों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रतियोगिताओं के दौरान डांस क्लासेस, सांस्कृतिक प्रशिक्षण और नाट्य कला से जुड़ी गतिविधियों में भाग लेते हैं। कई प्रतिभावान कलाकार जिला स्तर तक पुरस्कार भी हासिल कर चुके हैं।
इसके बावजूद शहर में आज तक एक सुसज्जित नाट्यगृह उपलब्ध नहीं हो सका है। परिणामस्वरूप सांस्कृतिक कार्यक्रमों, नाट्य प्रस्तुतियों, कला महोत्सवों और सामाजिक आयोजनों के लिए स्थानीय कलाकारों को उचित मंच नहीं मिल पा रहा। कला प्रेमियों का कहना है कि यदि शहर में आधुनिक नाट्यगृह होता तो नई प्रतिभाओं को आगे आने का अवसर मिलता और घुग्घुस की सांस्कृतिक पहचान भी मजबूत होती।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन बाद में वही फाइलें नगर परिषद कार्यालय के एसी केबिनों में धूल खाती रह जाती हैं। आम लोगों का कहना है कि नगर परिषद के मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, सभापति, इंजीनियर और संबंधित विभागों के अधिकारी कागजी प्रक्रियाओं और नियमों का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारियों से बचते दिखाई देते हैं।
जनता के बीच यह चर्चा भी तेज है कि नगर परिषद कार्यालयों में बैठकर “सब ठीक है” की रिपोर्ट तैयार कर देना आसान है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आती है। शहर की मूलभूत समस्याएं वर्षों से जस की तस बनी हुई हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर विकास योजनाओं का वास्तविक लाभ जनता तक क्यों नहीं पहुंच रहा?
कई नागरिकों ने यह भी आरोप लगाया कि चुने हुए जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद जनता से दूरी बना लेते हैं। नगर परिषद कानूनों और विकास नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों और पदाधिकारियों पर है, वही यदि निष्क्रिय दिखाई दें तो विकास योजनाओं का भविष्य अधर में लटकना तय माना जाता है।
शहर में नाट्यगृह निर्माण का मुद्दा अब सिर्फ सांस्कृतिक सुविधा का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह सत्ता पक्ष की कार्यशैली, राजनीतिक विश्वसनीयता और नगर परिषद प्रशासन की जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है।
जनता अब यह देखने के इंतजार में है कि जाहिरनामे का 10वां वादा वास्तव में विकास में बदलता है या फिर बाकी अधूरे वादों की तरह राजनीतिक भाषणों तक सीमित रह जाता है। आने वाले वर्षों में सत्ता पक्ष का वास्तविक मूल्यांकन जनता जमीनी कार्यों के आधार पर ही करेगी, क्योंकि अब केवल घोषणाओं से नहीं बल्कि परिणामों से विश्वास बनता है।
प




