प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : घुग्घुस पुलिस स्टेशन और नायब तहसीलदार कार्यालय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले धानोरा पिपरी, पैनगंगा, बेलोरा, नकोडा समेत कई इलाकों में रात के समय कथित रूप से अवैध रेती परिवहन का खेल खुलेआम जारी होने की चर्चा तेज होती जा रही है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब पुलिस विभाग, महसूल विभाग, खनिकर्म विभाग, परिवहन विभाग और प्रदूषण नियंत्रण यंत्रणा जैसे अनेक सरकारी विभागों को कार्रवाई का अधिकार प्राप्त है, तब भी यह अवैध परिवहन आखिर लगातार कैसे जारी है?
स्थानीय नागरिकों में यह चर्चा अब खुलकर होने लगी है कि यदि रात के अंधेरे में भारी मात्रा में रेती से भरे ट्रैक्टर, डंपर और टिपर सड़कों पर दौड़ रहे हैं, तो संबंधित विभागों को इसकी जानकारी न होना संभव नहीं माना जा सकता। ऐसे में प्रशासन की चुप्पी और निष्क्रियता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, “पाणीयुक्त रेती” अर्थात नदी से सीधे निकाली गई गीली रेती का परिवहन केवल खनिकर्म नियमों का उल्लंघन नहीं माना जाता, बल्कि यह भूजल और पर्यावरण के लिए भी गंभीर खतरे का संकेत हो सकता है। नियमों के अनुसार रेती उत्खनन, संग्रहण और परिवहन के लिए वैध अनुमति, रॉयल्टी पावती, पर्यावरण मंजूरी और निर्धारित समयसीमा का पालन आवश्यक होता है। इसके बावजूद यदि रात में रेती परिवहन हो रहा है, तो यह प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
महाराष्ट्र में रेती घाटों का संचालन मुख्य रूप से महसूल विभाग, खनिकर्म संचालनालय और जिला प्रशासन के नियंत्रण में होता है। Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957, Environment Protection Act, 1986 तथा महाराष्ट्र शासन के खनिकर्म नियमों के तहत रेती उत्खनन को नियंत्रित किया जाता है। नियमों के अनुसार सामान्यतः सूर्योदय से सूर्यास्त तक ही उत्खनन और परिवहन की अनुमति होती है। मानसून के दौरान अधिकांश नदियों में उत्खनन पर रोक रहती है।
नियम यह भी कहते हैं कि रेती केवल अधिकृत स्टॉक यार्ड में ही जमा की जा सकती है तथा प्रत्येक वाहन के पास वैध रॉयल्टी स्लिप होना अनिवार्य है। बावजूद इसके कई क्षेत्रों में कथित रूप से बिना नंबर प्लेट, ओवरलोड और बिना दस्तावेज वाले वाहन रातभर चलते दिखाई देने की शिकायतें सामने आती रही हैं।
सबसे गंभीर विषय नदी में मशीनों के उपयोग को लेकर सामने आ रहा है। पर्यावरणीय नियमों के अनुसार कई स्थानों पर JCB, पोकलेन और हिटाची जैसी भारी मशीनों से नदी में उत्खनन प्रतिबंधित माना जाता है। केवल विशेष सरकारी अनुमति या पर्यावरणीय स्वीकृति होने पर ही मशीनरी के उपयोग की अनुमति दी जा सकती है। इसके बावजूद यदि नदियों में मशीनें उतर रही हैं, तो यह सीधे पर्यावरणीय नियमों और न्यायालयीन निर्देशों की अवहेलना माना जा सकता है।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि अवैध रेती उत्खनन केवल राजस्व चोरी का मामला नहीं रह गया है, बल्कि इससे नदियों की गहराई बढ़ रही है, भूजल स्तर गिर रहा है, खेती प्रभावित हो रही है और पुलों की नींव तक खतरे में पड़ सकती है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अनियंत्रित उत्खनन से नदी का प्राकृतिक प्रवाह बदल सकता है, जिससे भविष्य में बाढ़ और जलसंकट जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं।
अब नागरिकों के बीच यह मांग भी उठने लगी है कि यदि किसी क्षेत्र में नियमबाह्य रेती परिवहन लगातार जारी रहता है, तो संबंधित क्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। कई लोगों का कहना है कि केवल वाहन चालकों या मजदूरों पर कार्रवाई कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि निगरानी में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर भी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
जनता के बीच यह चर्चा भी तेज हो रही है कि यदि किसी क्षेत्र में रातभर अवैध परिवहन चलता रहे और संबंधित यंत्रणाएं मौन बनी रहें, तो इसे केवल प्रशासनिक विफलता मानना पर्याप्त नहीं होगा। लोगों का कहना है कि ऐसी स्थिति में “अनदेखी” और “संभावित संरक्षण” जैसे गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट और National Green Tribunal द्वारा समय-समय पर अवैध रेती उत्खनन के खिलाफ सख्त निर्देश दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद यदि जमीनी स्तर पर नियमों का पालन नहीं हो रहा, तो यह कानून व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता दोनों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि संबंधित विभाग इस गंभीर विषय पर संयुक्त कार्रवाई करते हैं या फिर अवैध रेती परिवहन का यह कथित खेल यूं ही रात के अंधेरे में चलता रहेगा।




