प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस/चंद्रपुर: नगर परिषद घुग्घुस में पारदर्शिता, जवाबदेही और जनप्रतिनिधियों के अधिकारों को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। नियोजन एवं विकास समिति के सभापति रविश विनय सिंह द्वारा 30 जून 2026 को मुख्याधिकारी को भेजे गए विस्तृत पत्र के बाद अब यह मामला राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
सभापति ने अपने पत्र में वित्तीय वर्ष 2022-23 से 2025-26 तक के विकास कार्यों, लेबर भुगतान, निविदाओं, मापन पुस्तिकाओं (एमबी), अंतिम बिलों, ऑडिट रिपोर्ट, सरकारी अनुदान तथा आय-व्यय से संबंधित संपूर्ण अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां सात कार्य दिवसों के भीतर उपलब्ध कराने की मांग की थी। पत्र में उन्होंने महाराष्ट्र नगर परिषद, नगर पंचायत व औद्योगिक नगरी अधिनियम, 1965 तथा महाराष्ट्र नगर परिषद (कार्यसंचालन) नियम, 1966 की संबंधित धाराओं का उल्लेख करते हुए कहा था कि विषय समिति के सभापति के रूप में उन्हें परिषद के कार्यों की निगरानी और अभिलेखों के परीक्षण का वैधानिक अधिकार प्राप्त है।
हालांकि, सभापति के अनुसार मुख्याधिकारी ने जवाब में कहा कि मांगी गई जानकारी अत्यधिक विस्तृत है, इसलिए उसे सूचना का अधिकार (RTI) के माध्यम से तथा एक-एक विषय के आधार पर मांगा जाए।
यहीं से यह मामला राजनीतिक रंग लेने लगा है। नगर परिषद के भीतर और बाहर यह सवाल उठने लगा है कि यदि किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि और विषय समिति के सभापति को भी कार्यालय से इस प्रकार का उत्तर मिलता है, तो आम नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की स्थिति क्या होगी? क्या उन्हें भी हर बार केवल आरटीआई की प्रक्रिया अपनाने के लिए बाध्य किया जाएगा, जबकि वे सार्वजनिक धन से जुड़े मामलों में जानकारी मांग रहे हों?
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका केवल बैठकों तक सीमित नहीं होती, बल्कि विकास कार्यों की निगरानी, वित्तीय अनुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उनका दायित्व होता है। ऐसे में यदि जनप्रतिनिधियों द्वारा मांगी गई जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं होती, तो इससे पारदर्शिता और प्रशासनिक उत्तरदायित्व को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
दूसरी ओर, प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी पत्र में अत्यधिक व्यापक और विशाल मात्रा में जानकारी मांगी गई हो, तो कार्यालय उसे व्यवस्थित प्रक्रिया के माध्यम से उपलब्ध कराने का सुझाव दे सकता है। हालांकि, यह भी अपेक्षा की जाती है कि जहां कानून के तहत जनप्रतिनिधियों को अभिलेखों के निरीक्षण या जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है, वहां संबंधित प्रावधानों का पालन करते हुए उचित निर्णय लिया जाए।
इस पूरे घटनाक्रम ने नगर परिषद के विकास कार्यों, खर्च किए गए सार्वजनिक धन और अभिलेखों की पारदर्शिता को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। चर्चा यह भी है कि कहीं मांगी गई जानकारी केवल कागजों तक सीमित तो नहीं, जबकि जमीनी स्तर पर वास्तविक स्थिति अलग हो सकती है। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और इस प्रकार के किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
खबर लिखे जाने तक नगराध्यक्ष अथवा मुख्याधिकारी की ओर से इस पूरे विवाद पर कोई विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण या प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं की गई थी। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि नगर परिषद प्रशासन इस मामले पर क्या आधिकारिक रुख अपनाता है, क्या सभापति को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराई जाती है अथवा यह विवाद आगे राजनीतिक, प्रशासनिक या कानूनी स्तर तक पहुंचता है।




