Friday, May 1, 2026

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सरकारी स्कूलों की दुर्दशा: निजी स्वार्थ के कारण सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर संकट

प्रणयकुमार बंडी

घुग्घुस (चंद्रपुर): एक समय था जब गिने-चुने छात्र ही इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ते थे, लेकिन बदलते दौर में हर माता-पिता की यह चाहत बन गई है कि उनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम में ही शिक्षा ग्रहण करें. इसी मांग को ध्यान में रखते हुए सरकार ने सरकारी स्कूलों में सेमी इंग्लिश मीडियम की शुरुआत की, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकें और उनका भविष्य उज्जवल हो.

हालांकि, कुछ कथित राजनेता और उनके समर्थक निजी स्कूलों को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्कूलों के छात्रों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं. निजी स्वार्थ के चलते सरकारी स्कूलों की स्थिति लगातार बिगड़ रही है, जिससे कई विद्यालय बंद होने के कगार पर पहुंच चुके हैं.

सरकार को उठाने होंगे ठोस कदम

सरकार को चाहिए कि वह सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को और सशक्त करे. इसके लिए उच्च योग्यता प्राप्त शिक्षकों (DED, BEd डिग्री धारकों) की भर्ती, विभिन्न भाषाओं की शिक्षा पर जोर, और सरकारी स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर को सुधारने की दिशा में काम किया जाए.

इसके अलावा, सरकारी स्कूलों में पढ़े छात्रों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि समाज में शिक्षा का संतुलन बना रहे और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्र भी सरकारी नौकरियों में अपना स्थान सुरक्षित कर सकें.

निजी स्कूलों की निगरानी जरूरी

इसके साथ ही, सरकार को उन निजी स्कूलों पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जो सरकारी मानकों के अनुरूप शिक्षा नहीं दे रहे हैं. ऐसे स्कूलों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि शिक्षा का व्यवसायीकरण न हो और हर वर्ग के बच्चों को समान अवसर मिल सके.

अगर सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो सरकारी स्कूलों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है, जिससे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो सकता है.

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