प्रणयकुमार बंडी
घुग्घूस/चंद्रपुर। चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा जारी किए जाने वाले घोषणा-पत्रों में जनता के विकास, युवाओं के भविष्य और शहर के उत्थान से जुड़े बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। इन्हीं वादों में सत्ता पक्ष के घोषणा-पत्र का 24वां मुद्दा विशेष रूप से चर्चा में था, जिसमें कहा गया था कि “UPSC, MPSC व अन्य स्पर्धा परीक्षाओं की तैयारी के लिए निःशुल्क वाचनालय (लाइब्रेरी) का निर्माण किया जाएगा।”
घुग्घूस केवल एक औद्योगिक शहर नहीं, बल्कि प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की भूमि के रूप में भी अपनी पहचान रखता है। इस क्षेत्र के अनेक युवा व्यापार, सिविल सर्विसेज, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, पुलिस, शिक्षा, परिवहन और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी सफलता का परचम लहरा रहे हैं। बावजूद इसके, आज भी उच्च स्तरीय अध्ययन सुविधाओं के अभाव में अनेक विद्यार्थियों को बाहर के शहरों का रुख करना पड़ता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस स्तर की आधुनिक और सुसज्जित लाइब्रेरी घुग्घूस में वर्षों पहले बन जानी चाहिए थी, वह आज तक क्यों नहीं बन सकी? लाइब्रेरी के नाम पर लाखों रुपये खर्च होने के दावे किए गए, लेकिन उनकी वास्तविक स्थिति क्या है? क्या पुराने पुस्तकालयों और उन पर खर्च हुए धन की निष्पक्ष जांच होगी या फिर फाइलों में दर्ज आंकड़े धूल खाते रहेंगे?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि नगर परिषद क्षेत्र में टाउन प्लानिंग और सार्वजनिक स्थानों का उचित नियोजन नहीं होने के कारण विकास की कई योजनाएं केवल कागजों तक सीमित रह गई हैं। ऐसे में सत्ता पक्ष द्वारा दिखाया गया मुफ्त प्रतियोगी परीक्षा पुस्तकालय का सपना भी कहीं अधूरा सपना बनकर न रह जाए, इसकी चर्चा अब आम हो चुकी है।
जनता यह भी जानना चाहती है कि इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए भूमि कहां है? फंड कहां है? प्रशासनिक मंजूरी की स्थिति क्या है? और सबसे महत्वपूर्ण, अब तक इस दिशा में वास्तविक काम कितना हुआ है?
आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि नगर परिषद के कई जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि वातानुकूलित कार्यालयों में बैठकर फाइलों के पन्ने पलटने में व्यस्त हैं, जबकि जमीनी स्तर पर विकास कार्यों की तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, सभापति, इंजीनियर और संबंधित विभागों की भूमिका पर लगातार प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि युवाओं के भविष्य से जुड़े इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीरता दिखाई जाती तो आज घुग्घूस के विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आधुनिक अध्ययन केंद्र उपलब्ध हो चुका होता। लेकिन वर्तमान स्थिति में न तो लाइब्रेरी दिखाई दे रही है और न ही उसके निर्माण की कोई स्पष्ट रूपरेखा।
घुग्घूस सहित आसपास के गांवों के लोगों की निगाहें अब सत्ता पक्ष और नगर परिषद प्रशासन पर टिकी हुई हैं। जनता यह देख रही है कि घोषणा-पत्र का 24वां वादा केवल चुनावी आकर्षण था या वास्तव में युवाओं के भविष्य को संवारने की गंभीर पहल।
फिलहाल सवाल बरकरार हैं, जवाब कहीं दिखाई नहीं दे रहे। मुफ्त प्रतियोगी परीक्षा पुस्तकालय का सपना कब हकीकत बनेगा, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि जनता अब वादों से अधिक काम का हिसाब मांग रही है। अगले वर्षों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि राजनीति जीती या जनता की अपेक्षाएं। क्योंकि आखिरकार किसी भी सत्ता का असली मूल्यांकन उसके भाषणों से नहीं, बल्कि पांच वर्षों के काम से होता है।




