प्रणयकुमार बंडी
घुग्घूस/चंद्रपुर। घुग्घूस पुलिस स्टेशन अंतर्गत उसगांव स्थित एक पावर प्लांट पिछले कई महीनों से कथित रूप से पर्यावरणीय नियमों को ताक पर रखकर खुलेआम प्रदूषण फैला रहा है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि प्लांट की चिमनियों से लगातार निकल रहा घना धुआं आसपास के गांवों के लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन चुका है, लेकिन जिम्मेदार विभागों की ओर से अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल (MPCB), जिला प्रशासन, पंचायत समिति, जिला परिषद तथा अन्य संबंधित विभाग आखिर इस मामले में मौन क्यों हैं? यदि प्रदूषण नियंत्रण के नियमों का उल्लंघन हो रहा है तो संबंधित कंपनी के खिलाफ अब तक पर्यावरण कानूनों के तहत एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई?
स्थानीय नागरिकों के बीच यह चर्चा भी तेज हो रही है कि आखिर घुग्घूस पुलिस स्टेशन और जिला पुलिस प्रशासन की भूमिका क्या है? लोगों का कहना है कि यदि कोई सामान्य नागरिक कानून तोड़ता है तो उस पर तत्काल कार्रवाई होती है, लेकिन वर्षों से प्रदूषण फैलाने के आरोप झेल रही कंपनी के खिलाफ कठोर कानूनी कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं? क्या यह प्रशासनिक उदासीनता है या फिर किसी प्रकार की साठगांठ?
क्षेत्र के लोगों का आरोप है कि घुग्घूस और आसपास के गांवों में कैंसर, टीबी, दमा, लीवर और किडनी संबंधी बीमारियों के साथ-साथ हार्ट अटैक, पैरालिसिस, त्वचा रोग, बाल झड़ना, आंखों में जलन और कानों की समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। नागरिकों का कहना है कि इन बीमारियों के आंकड़े सरकारी अस्पतालों में भी देखे जा सकते हैं। हालांकि इन बीमारियों का सीधा संबंध संबंधित उद्योग से है या नहीं, इसकी पुष्टि वैज्ञानिक और चिकित्सकीय जांच के बाद ही संभव है, लेकिन लोगों की चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।
स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी अपने अधिकारों और सुरक्षा के लिए आंदोलन करते हैं, राजनीतिक दल विभिन्न मुद्दों पर सड़क पर उतरते हैं, लेकिन पर्यावरण और जनस्वास्थ्य से जुड़े इतने गंभीर विषय पर व्यापक जनआंदोलन क्यों नहीं हो रहा? यदि प्रदूषण वास्तव में बीमारियों की जड़ है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग को लेकर आवाजें बुलंद क्यों नहीं की जा रहीं?
जनता के बीच यह चर्चा भी है कि जो नेता कल तक प्रदूषण के खिलाफ आंदोलन करते थे, सत्ता में आने के बाद उनकी आवाज क्यों शांत हो गई है? वहीं विपक्ष की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। लोगों का कहना है कि पर्यावरण और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष दोनों की चुप्पी कई तरह के संदेह पैदा कर रही है।
अब क्षेत्र की जनता पूछ रही है कि आखिर यह स्थिति कब तक चलेगी? क्या शासन-प्रशासन किसी बड़ी अप्रिय घटना का इंतजार कर रहा है? क्या औद्योगिक विकास के नाम पर पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी की जा रही है? या फिर प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े नियम और मानक केवल कागजों तक ही सीमित रह गए हैं?
इन तमाम सवालों के जवाब प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और संबंधित कंपनी को जनता के सामने स्पष्ट करने होंगे, क्योंकि मामला केवल पर्यावरण का नहीं बल्कि हजारों लोगों के स्वास्थ्य और भविष्य का भी है।




