प्रणयकुमार बंडी
घुग्घूस/चंद्रपुर। घुग्घूस नगर परिषद की नियोजन एवं विकास समिति के सभापति रवीश विनय सिंह ने लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी लिमिटेड पर पर्यावरणीय नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाने, खेतों और पेड़ों के विनाश, नदी के जल के कथित दोहन तथा स्थानीय प्रशासन के साथ मिलीभगत के गंभीर आरोप लगाए हैं। मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा सभापति, जिलाधिकारी और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल को भेजी गई शिकायत ने क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों और प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कंपनी के संचालन से पूरे घुग्घूस क्षेत्र में लौह अयस्क और धूल प्रदूषण का स्तर चिंताजनक रूप से बढ़ गया है। दावा किया गया है कि कागजों पर दिखाई जाने वाली ग्रीन बेल्ट जमीन पर नजर नहीं आती और प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवश्यक उपाय प्रभावी रूप से लागू नहीं किए गए हैं। यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन होगा बल्कि स्थानीय नागरिकों, विशेषकर बच्चों के स्वास्थ्य के साथ गंभीर खिलवाड़ भी माना जाएगा।
सबसे गंभीर आरोपों में से एक कंपनी विस्तार के नाम पर खेतों और हरित क्षेत्र के कथित विनाश का है। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि सैटेलाइट इमेजरी और ऐतिहासिक भू-आंकड़ों के आधार पर जांच कर यह पता लगाया जाए कि बीते वर्षों में क्षेत्र में कितने पेड़ और कृषि भूमि समाप्त हुई। यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि पर्यावरणीय मंजूरियों और भूमि उपयोग परिवर्तन से जुड़े नियमों का पालन किसी भी औद्योगिक परियोजना के लिए अनिवार्य होता है।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि कंपनी द्वारा नदी क्षेत्र के आसपास निर्माण कार्य किए जा रहे हैं और औद्योगिक उपयोग के लिए बड़े पैमाने पर पानी लिया जा रहा है, जबकि स्थानीय नागरिक स्वयं पेयजल संकट का सामना कर रहे हैं। साथ ही आरोप है कि औद्योगिक अपशिष्ट जल के उपचार की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है और प्रदूषित पानी आसपास के नालों और जल स्रोतों में छोड़ा जा रहा है। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह जल प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के दुरुपयोग का गंभीर मामला बन सकता है।
मामले का एक और संवेदनशील पहलू कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) से जुड़ा है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि स्थानीय विकास के बजाय CSR गतिविधियों का उपयोग कंपनी की छवि निर्माण तक सीमित है। साथ ही स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता न देने का मुद्दा भी उठाया गया है, जिससे क्षेत्र में असंतोष बढ़ने की बात कही जा रही है।
हालांकि सबसे तीखा आरोप प्रशासनिक तंत्र पर लगाया गया है। शिकायतकर्ता का दावा है कि घुग्घूस नगर परिषद के मुख्याधिकारी द्वारा महत्वपूर्ण दस्तावेज, पानी आवंटन से संबंधित रिकॉर्ड और अन्य प्रशासनिक जानकारियां उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। इससे यह प्रश्न उठ रहा है कि यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है तो फिर पारदर्शिता से परहेज क्यों किया जा रहा है? लोकतांत्रिक संस्थाओं में चुने हुए जनप्रतिनिधियों को जानकारी न मिलना स्वयं में चिंता का विषय माना जा रहा है।
शिकायत में कंपनी के संचालन की उच्चस्तरीय जांच, कथित अवैध पेड़ कटाई और भूमि विनाश पर एफआईआर, CSR फंड की फॉरेंसिक ऑडिट, नदी क्षेत्र में निर्माण कार्यों पर रोक तथा संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। शिकायतकर्ता ने चेतावनी भी दी है कि यदि मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो जन आंदोलन शुरू किया जाएगा और मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तथा उच्च न्यायालय तक ले जाया जाएगा।
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि खबर लिखे जाने तक इन आरोपों पर शासन, प्रशासन, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल अथवा लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी लिमिटेड की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसलिए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
फिलहाल, घुग्घूस में उठे ये सवाल केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह बहस भी छेड़ते हैं कि औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी आखिर कौन निभाएगा—और जब आरोप सीधे प्रशासनिक तंत्र पर लग रहे हों, तब निष्पक्ष जांच सुनिश्चित कौन करेगा।




