प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : नगर परिषद चुनाव 2025 के दौरान सत्ता पक्ष द्वारा जारी किए गए आकर्षक चुनावी जाहिरनामे में शहर के विकास से जुड़े कुल 37 मुद्दों को प्रमुखता से रखा गया था। इनमें क्रमांक 21 पर “संपूर्ण शहर को खड्डामुक्त (गड्ढामुक्त) करने” का वादा भी शामिल था। चुनाव के समय यह वादा जनता के बीच खूब चर्चा का विषय बना और कई नेताओं ने इसे विकास के बड़े संकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन चुनाव के पांच महीने बाद भी शहर की जमीनी हकीकत इस दावे से मेल खाती दिखाई नहीं दे रही है।
घुग्घुस शहर के अनेक प्रमुख मार्ग, मार्केट लाइन, विभिन्न प्रभागों की सड़कें तथा सार्वजनिक संस्थानों के सामने के रास्ते आज भी बड़े-बड़े गड्ढों से भरे पड़े हैं। कई स्थानों पर सड़कें उखड़ चुकी हैं, जबकि कुछ जगहों पर जलापूर्ति पाइपलाइन, नल कनेक्शन, अंडरग्राउंड केबल, मरम्मत कार्य और अन्य खुदाई के बाद रास्तों को पूर्ववत करने की जिम्मेदारी मानो किसी ने ली ही नहीं।
सबसे गंभीर स्थिति उन मुख्य मार्गों की है, जहां से प्रतिदिन भारी औद्योगिक वाहनों का आवागमन होता है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सड़क की क्षमता से अधिक वजन वाले ट्रकों की आवाजाही के कारण सड़कें तेजी से क्षतिग्रस्त हो रही हैं। सरकारी अस्पताल, बस स्टॉप, पुलिस स्टेशन, निजी अस्पतालों तथा अन्य महत्वपूर्ण स्थलों के आसपास के गड्ढे नागरिकों के लिए परेशानी और दुर्घटना का कारण बन रहे हैं।
जिम्मेदार कौन?
सवाल यह उठ रहा है कि जिन कंपनियों के भारी वाहन लगातार इन मार्गों का उपयोग करते हैं, क्या उनसे सड़क मरम्मत और सड़क सुरक्षा मानकों के पालन की जवाबदेही तय की गई है? क्या नगर परिषद, लोक निर्माण विभाग (PWD), जिला प्रशासन अथवा अन्य संबंधित विभागों ने इन कंपनियों को आधिकारिक नोटिस या निर्देश जारी किए हैं? यदि किए हैं तो उनका पालन क्यों नहीं हो रहा? और यदि नहीं किए गए, तो आखिर किसके संरक्षण में यह लापरवाही जारी है?
इन सवालों ने शहर में नई चर्चाओं को जन्म दिया है। कुछ नागरिकों का कहना है कि विकास के नाम पर राजनीति तो खूब हुई, लेकिन जवाबदेही तय करने की इच्छाशक्ति कहीं दिखाई नहीं दे रही। ऐसे में यह भी चर्चा का विषय बन चुका है कि कहीं प्रशासन, जनप्रतिनिधि और संबंधित संस्थाएं एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर अपनी जवाबदेही से बच तो नहीं रहे हैं।
चुनावी मुद्दा बना, फिर ठंडे बस्ते में गया?
चुनाव के दौरान सड़कों और गड्ढों का मुद्दा कई उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के लिए बड़ा हथियार बना था। कई नेताओं ने जनता के बीच जाकर खराब सड़कों की तस्वीरें दिखाईं, आंदोलन किए और समाधान का भरोसा दिलाया। लेकिन सत्ता मिलने के बाद वही मुद्दा अब धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में जाता दिखाई दे रहा है।
जनता के बीच अब यह सवाल उठने लगा है कि “संपूर्ण शहर को खड्डामुक्त करने” का वादा आखिर कब पूरा होगा? क्या यह सिर्फ चुनावी मंचों तक सीमित एक राजनीतिक जुमला था या वास्तव में इसके लिए कोई ठोस कार्ययोजना बनाई गई थी?
टाउन प्लानिंग और विकास पर भी सवाल
शहर में लगातार सामने आ रही सड़क संबंधी समस्याओं ने नगर परिषद की टाउन प्लानिंग, विकास नीति और रखरखाव व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। नागरिकों का कहना है कि यदि नियमित निरीक्षण, समयबद्ध मरम्मत, आपातकालीन रखरखाव और दीर्घकालिक योजना पर प्रभावी ढंग से काम किया जाता, तो स्थिति इतनी खराब नहीं होती।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि सड़क निर्माण के बाद विभिन्न विभागों द्वारा बार-बार की जाने वाली खुदाई पर नियंत्रण, गुणवत्तापूर्ण निर्माण सामग्री का उपयोग, भारी वाहनों के लिए अलग प्रबंधन और जवाबदेही तय किए बिना समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
पहला साल, पहला रिपोर्ट कार्ड
सत्ता पक्ष के चुनावी जाहिरनामे का यह 21वां मुद्दा अब जनता के बीच पहले साल के रिपोर्ट कार्ड के रूप में देखा जा रहा है। नागरिक यह जानना चाहते हैं कि इस दिशा में अब तक कितना काम हुआ, कितना फंड खर्च हुआ और आगे की क्या योजना है।
फिलहाल घुग्घुस की जनता सड़कों पर मौजूद गड्ढों को देखकर अपने-अपने निष्कर्ष निकाल रही है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि चुनावी वादे विकास में बदलते हैं या फिर केवल भाषणों और पोस्टरों तक सीमित रह जाते हैं।
अब निगाहें नगर परिषद प्रशासन, संबंधित विभागों और सत्ता पक्ष पर टिकी हैं। जनता इंतजार कर रही है कि खड्डामुक्त शहर का वादा धरातल पर उतरता है या फिर यह भी राजनीतिक घोषणाओं की लंबी सूची में शामिल होकर इतिहास बन जाता है। आखिर सही कौन था—जनता की चिंता या राजनीति की रणनीति? इसका जवाब आने वाले वर्षों में विकास कार्यों की वास्तविक तस्वीर ही देगी।




