हर दिन इतिहास के झरोखे से कुछ खास यादें हमारे सामने आती हैं जो हमें प्रेरणा देती हैं, हमारे अतीत की झलक दिखाती हैं। 25 मई का दिन भी इतिहास में विशेष स्थान रखता है, क्योंकि इसी दिन वर्ष 1916 में उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में एक महान स्वतंत्रता सेनानी श्रीदेव सुमन का जन्म हुआ था।
श्रीदेव सुमन: स्वतंत्रता संग्राम का एक अमर सिपाही
श्रीदेव सुमन एक ऐसा नाम है, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में साहस, बलिदान और निष्ठा का प्रतीक है। उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ, लेकिन विचारों में वह असाधारण थे। उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग को अपनाया।
ब्रिटिश शासन के साथ-साथ उन्होंने टिहरी रियासत की निरंकुशता और जनविरोधी नीतियों का भी डटकर विरोध किया। वे चाहते थे कि टिहरी की जनता को भी स्वतंत्र भारत का वही अधिकार मिले, जो देश के बाकी हिस्सों को मिल रहा था।
जेल में अमानवीय अत्याचार और बलिदान
उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते टिहरी राजशाही ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। जेल में उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। उन्होंने अन्याय के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू की, जो कई दिनों तक चली। अंततः 25 जुलाई 1944 को उन्होंने जेल में ही प्राण त्याग दिए। मात्र 28 वर्ष की आयु में उनका यह बलिदान अमर हो गया।
स्मृति और प्रेरणा
आज श्रीदेव सुमन को उनके त्याग, साहस और राष्ट्रप्रेम के लिए याद किया जाता है। उत्तराखंड सरकार ने उनके सम्मान में कई संस्थानों और सड़कों के नाम उनके नाम पर रखे हैं। उनके जीवन से यह संदेश मिलता है कि स्वतंत्रता केवल एक राजनीतिक स्थिति नहीं, बल्कि जनमानस की आवाज है, जिसे दबाया नहीं जा सकता।
25 मई का दिन हमें न केवल श्रीदेव सुमन जैसे वीर सपूत की याद दिलाता है, बल्कि यह भी सिखाता है कि सच्चे बदलाव के लिए त्याग और निष्ठा आवश्यक है। आइए, हम सभी उनके आदर्शों को जीवन में अपनाकर समाज और देश के विकास में अपना योगदान दें।




