प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : घुग्घुस नगर परिषद के प्रभाग क्रमांक 6 में टेकड़ी परिसर स्थित RO वाटर प्लांट पिछले कई महीनों से बंद पड़ा होने की चर्चा अब स्थानीय नागरिकों के बीच जोर पकड़ रही है। भीषण गर्मी के दौरान नागरिकों ने पानी की किल्लत झेली, लेकिन गर्मी का दौर बीतने के बाद भी यदि सार्वजनिक सुविधा के लिए बनाया गया RO प्लांट बंद पड़ा है, तो यह केवल तकनीकी खराबी का मामला नहीं, बल्कि जनहित, जवाबदेही और सार्वजनिक धन के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस व्यवस्था को सुचारु रखने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? प्रभाग के नगर सेवक/नगर सेविका, नगराध्यक्ष, पानीपुरवठा सभापति, बांधकाम सभापति, नियोजन एवं प्लानिंग सभापति तथा नगर परिषद के मुख्याधिकारी की भूमिका इस मामले में नागरिकों को स्पष्ट क्यों नहीं दिखाई दे रही है?

सरकारी योजना, जनता का पैसा और बंद सुविधा—जवाब कौन देगा?
RO वाटर प्लांट जैसे सार्वजनिक उपक्रम पर निर्माण, मशीनरी, विद्युत व्यवस्था, पाइपलाइन, मरम्मत और रखरखाव के नाम पर नगर परिषद द्वारा खर्च किया जाता है। ऐसे में नागरिकों का सीधा सवाल है कि प्लांट के निर्माण से लेकर अब तक मेंटेनेंस और मरम्मत पर कुल कितनी राशि खर्च हुई? किस ठेकेदार या एजेंसी को काम दिया गया? कितने समय की वारंटी/AMC थी? प्लांट बंद होने का तकनीकी कारण क्या है और उसे ठीक कराने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई? जनता की मांग है कि इन सभी सवालों का विवरण सार्वजनिक रूप से प्रभाग के नागरिकों के सामने रखा जाए।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए
नगर परिषद में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका केवल बैठकों तक सीमित नहीं हो सकती। यदि किसी प्रभाग में महीनों से सार्वजनिक सुविधा बंद है, तो संबंधित जनप्रतिनिधियों को प्रशासन से जवाब मांगना और समस्या का समाधान करवाना चाहिए।
इसी तरह पानीपुरवठा, बांधकाम तथा नियोजन से संबंधित समितियों और अधिकारियों की जिम्मेदारी भी सवालों के घेरे में आती है। क्या संबंधित समिति ने इस RO प्लांट की स्थिति की समीक्षा की? क्या निरीक्षण रिपोर्ट तैयार हुई? क्या मरम्मत का प्रस्ताव मंजूर हुआ? यदि हुआ तो काम कब शुरू होगा?
RTI और रिकॉर्ड से सामने आ सकती है पूरी तस्वीर
नागरिकों के पास सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत इस मामले की जानकारी मांगने का कानूनी रास्ता भी उपलब्ध है। RO प्लांट की प्रशासनिक और वित्तीय जानकारी जैसे मंजूर निधि, निविदा, वर्क ऑर्डर, बिल, भुगतान, मेंटेनेंस खर्च, AMC, निरीक्षण रिपोर्ट, मशीनरी की स्थिति और मरम्मत संबंधी पत्राचार रिकॉर्ड से सामने लाया जा सकता है।
यदि सार्वजनिक धन खर्च करने के बावजूद सुविधा लंबे समय तक बंद रहती है, तो प्रशासन को यह बताना होगा कि समस्या कहां है—योजना में, रखरखाव में, ठेकेदारी व्यवस्था में या निगरानी में?
‘जल सुविधा’ का बोर्ड काफी नहीं, पानी भी चाहिए
जनता को योजनाओं और उद्घाटन की तस्वीरों से ज्यादा जरूरत नियमित सुविधा की है। सार्वजनिक RO प्लांट का उद्देश्य नागरिकों को स्वच्छ और सुलभ पेयजल उपलब्ध कराना है। यदि प्लांट महीनों तक बंद पड़ा रहता है, तो उसकी उपयोगिता पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है।
अब नागरिकों की निगाह इस बात पर है कि नगर परिषद प्रशासन और संबंधित जनप्रतिनिधि कब जागते हैं और कब बंद RO प्लांट को फिर से शुरू करवाते हैं।
घुग्घुस के नागरिकों की मांग स्पष्ट है—RO प्लांट तत्काल शुरू किया जाए, तकनीकी खराबी और बंद रहने का कारण सार्वजनिक किया जाए तथा निर्माण एवं मेंटेनेंस पर हुए खर्च का पूरा हिसाब जनता के सामने रखा जाए।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक RO प्लांट के बंद होने का नहीं है—सवाल यह है कि जनता के पैसे से बनी सुविधा जनता तक पहुंच रही है या नहीं?




