अंतर्राज्यीय ठेकेदारों, इंजीनियरों, टेक्निशियनों और मजदूरों के पुलिस सत्यापन की मांग; अस्थायी कामगार परिसर में मारपीट की घटना के बाद कानून-व्यवस्था पर उठे सवाल
प्रणयकुमार बंडी
घुग्घूस/चंद्रपुर : घुग्घूस, उसगांव और म्हातारदेवी परिसर में 14 एवं 17 नंबर गेट क्षेत्र के आसपास विस्ताराधीन औद्योगिक परियोजनाओं में विभिन्न राज्यों से आए ठेकेदारों, इंजीनियरों, टेक्निशियनों और मजदूरों की बड़ी संख्या में मौजूदगी के बीच स्थानीय स्तर पर कानून-व्यवस्था और सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगे हैं। गुरुवार को विस्ताराधीन कंपनी के अस्थायी कामगार परिसर में कथित तौर पर किसी बात को लेकर कहासुनी के बाद मारपीट की घटना सामने आने की जानकारी है। इस घटना में कुछ युवक घायल हुए और उन्हें उपचार के लिए सरकारी चिकित्सालय भेजे जाने की बात कही जा रही है।

घटना की आधिकारिक पुलिस पुष्टि, घायलों की संख्या तथा प्रकरण में दर्ज धाराओं की जानकारी सामने आने के बाद ही घटना की पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। इसलिए मारपीट के कारण और जिम्मेदार व्यक्तियों को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय निष्पक्ष पुलिस जांच की आवश्यकता महत्वपूर्ण बन गई है।
पुलिस सत्यापन हुआ या नहीं?
स्थानीय स्तर पर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना, गुजरात, मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों से काम के लिए लाए गए ठेकेदारों, इंजीनियरों, टेक्निशियनों और मजदूरों के पहचान-पत्र, स्थायी पते तथा आपराधिक पूर्ववृत्त का नियमानुसार सत्यापन किया गया है या नहीं।
महाराष्ट्र पुलिस की आधिकारिक जानकारी के अनुसार अपराध की रोकथाम एवं जांच के साथ-साथ पुलिस की जिम्मेदारियों में चरित्र और पूर्ववृत्त का सत्यापन भी शामिल है। ऐसे में औद्योगिक परियोजनाओं में बड़ी संख्या में बाहरी श्रमिकों की नियुक्ति होने पर स्थानीय पुलिस और संबंधित प्रशासन के स्तर पर सुरक्षा संबंधी समन्वय कितना प्रभावी है, यह जांच का विषय हो सकता है।
‘हिंसक प्रवृत्ति’ के आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी
स्थानीय नागरिकों के बीच कुछ बाहरी कामगारों के कथित तौर पर हिंसक व्यवहार को लेकर चर्चा होने की बात सामने आ रही है। हालांकि किसी व्यक्ति को ‘गुंडा’ या ‘आपराधिक प्रवृत्ति का’ बताने से पहले उसके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों और न्यायिक रिकॉर्ड की पुष्टि आवश्यक है।
यदि किसी कामगार के विरुद्ध पहले से आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं अथवा वर्तमान में मारपीट जैसी घटना में उसकी भूमिका पाई जाती है, तो पुलिस द्वारा कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं केवल दूसरे राज्य का निवासी होने के आधार पर किसी कामगार को संदिग्ध मानना उचित नहीं होगा।
आत्महत्या की चर्चाओं पर भी आधिकारिक जांच जरूरी
परिसर में कुछ मजदूरों की कथित आत्महत्या अथवा मौत को लेकर भी चर्चाएं होने की बात कही जा रही है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। किसी भी मौत को आत्महत्या, हत्या या अन्य कारण से जोड़ने से पहले पुलिस जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड को आधार बनाया जाना चाहिए।
यदि किसी कामगार की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हुई है, तो पुलिस को मामले की परिस्थितियों, घटनास्थल, मेडिकल एवं पोस्टमार्टम रिकॉर्ड तथा अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए।
औद्योगिक परियोजना में सुरक्षा केवल उत्पादन तक सीमित नहीं
विस्ताराधीन औद्योगिक परियोजनाओं में काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा केवल मशीनरी या कार्यस्थल तक सीमित नहीं है। केंद्र सरकार के श्रम मंत्रालय के अनुसार औद्योगिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और श्रमिक कल्याण से संबंधित वैधानिक व्यवस्था में कार्यस्थल पर सुरक्षित परिस्थितियां सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है।
निर्माण कार्यों में लगे श्रमिकों के लिए भी सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण से संबंधित अलग वैधानिक व्यवस्था मौजूद है। इसलिए अस्थायी कामगार परिसर, श्रमिकों के रहने की व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था, आपातकालीन चिकित्सा सुविधा तथा विवाद की स्थिति में तत्काल हस्तक्षेप जैसे मुद्दों की भी समीक्षा आवश्यक है।
स्थानीय नागरिकों की सुरक्षा का सवाल
यदि औद्योगिक परियोजनाओं में बड़ी संख्या में बाहरी कामगार रह रहे हैं, तो कंपनी प्रबंधन, ठेकेदार, स्थानीय पुलिस और प्रशासन के बीच नियमित समन्वय होना आवश्यक है। स्थानीय नागरिकों को किसी भी प्रकार की हिंसा या भय का वातावरण महसूस न हो, इसके लिए शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई और संवेदनशील क्षेत्रों में पुलिस की निगरानी महत्वपूर्ण हो सकती है।
महाराष्ट्र में ग्राम पुलिस से संबंधित वैधानिक व्यवस्था महाराष्ट्र ग्राम पोलीस अधिनियम के अंतर्गत है। हालांकि पुलिस पाटिल की भूमिका को लेकर किसी विशिष्ट घटना में निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित क्षेत्र की प्रशासनिक व्यवस्था और उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच जरूरी होगी।
जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
स्थानीय नागरिकों की ओर से यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि औद्योगिक विस्तार के दौरान स्थानीय जनप्रतिनिधि, पुलिस प्रशासन, संबंधित औद्योगिक विभाग तथा पर्यावरणीय नियामक एजेंसियां सुरक्षा और जनहित से जुड़े मामलों की कितनी नियमित निगरानी कर रही हैं।
मुद्दा किसी एक राज्य या समुदाय के कामगारों का नहीं, बल्कि सभी कामगारों और स्थानीय नागरिकों की सुरक्षा, कानून का पालन तथा प्रशासनिक जवाबदेही का है।
प्रशासन से उठे प्रमुख सवाल
- विस्ताराधीन परियोजनाओं में कार्यरत बाहरी कामगारों का पहचान एवं पूर्ववृत्त सत्यापन हुआ है या नहीं?
- ठेकेदारों और श्रमिकों का पूरा रिकॉर्ड स्थानीय प्रशासन तथा पुलिस के पास उपलब्ध है या नहीं?
- गुरुवार की मारपीट की घटना में पुलिस ने क्या कार्रवाई की?
- घायल युवकों की मेडिकल रिपोर्ट और घटना की जांच की स्थिति क्या है?
- परिसर में पूर्व में हुई कथित हिंसक घटनाओं की शिकायतें पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हैं या नहीं?
- कथित श्रमिक मौतों के संबंध में कोई पुलिस जांच या पोस्टमार्टम रिकॉर्ड उपलब्ध है या नहीं?
- अस्थायी कामगार परिसर में सुरक्षा, निगरानी और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था पर्याप्त है या नहीं?
- कंपनी और ठेकेदार श्रमिकों के बीच विवाद रोकने के लिए क्या व्यवस्था लागू कर रहे हैं?
- स्थानीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर पुलिस और प्रशासन की क्या कार्ययोजना है?
फिलहाल इन सवालों का स्पष्ट उत्तर संबंधित कंपनी प्रबंधन, पुलिस प्रशासन और अन्य सक्षम अधिकारियों के आधिकारिक पक्ष से ही सामने आ सकता है। औद्योगिक विकास के साथ स्थानीय नागरिकों और कामगारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन तथा संबंधित प्रतिष्ठानों की प्राथमिक जिम्मेदारियों में होना चाहिए। महाराष्ट्र पुलिस भी कानून-व्यवस्था, अपराध की रोकथाम और अपराधों की जांच को अपने प्रमुख कार्यों में शामिल करती है।




