16 सितंबर के बाद 22 सितंबर को फिर सौंपा गया पत्र; साई नगर के नागरिकों ने सार्वजनिक खुली जगह को गार्डन, वॉकिंग ट्रैक और ओपन जिम के लिए सुरक्षित रखने की मांग की
प्रणयकुमार बंडी
घुग्घूस/चंद्रपुर : घुग्घूस नगर परिषद के (वार्ड नं. 6) प्रभाग क्रमांक.3 स्थित साई नगर के Survey No.103 की सार्वजनिक खुली जमीन को लेकर अब प्रशासनिक स्तर पर हलचल बढ़ने की संभावना है। क्षेत्र के नागरिकों ने सार्वजनिक भूमि के संरक्षण और उसके जनहित में उपयोग की मांग को लेकर नगर परिषद प्रशासन को लगातार दो पत्र सौंपे हैं। पहला पत्र 16 सितंबर 2026 को तथा दूसरा पत्र 22 सितंबर 2026 को प्रस्तुत किया गया।

नागरिकों का कहना है कि Survey No. 103 में स्थित खुली जगह पूरे क्षेत्र के नागरिकों के साझा उपयोग के लिए सुरक्षित रहनी चाहिए। उनके अनुसार, उन्हें जानकारी मिली है कि इस स्थान पर बुद्ध विहार के निर्माण के लिए नगर परिषद के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया गया है। हालांकि, नागरिकों ने अपने पत्र में यह भी स्पष्ट किया है कि उन्हें प्रस्तावित निर्माण की पूरी प्रक्रिया, भूमि की वैधानिक स्थिति और संबंधित दस्तावेजों की जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए उन्होंने नगर परिषद से किसी भी निर्णय से पहले भूमि की प्रकृति और वैधानिक स्थिति की जांच करने की मांग की है।
धार्मिक आस्था का सम्मान, लेकिन सार्वजनिक जमीन के उपयोग पर सवाल
नागरिकों ने अपने पत्र में कहा है कि क्षेत्र में विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग रहते हैं और वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। उनका मुख्य सवाल किसी धर्म या समुदाय के विरोध का नहीं, बल्कि सार्वजनिक खुली जमीन के उपयोग और उसके भविष्य से जुड़ा है।
पत्र में मांग की गई है कि यदि Survey No. 103 वास्तव में सार्वजनिक उपयोग की भूमि है, तो इसे किसी एक धार्मिक अथवा निजी उपयोग के बजाय क्षेत्र के सभी नागरिकों के लिए सुरक्षित रखा जाए। इसके स्थान पर गार्डन, वॉकिंग ट्रैक और ओपन जिम/व्यायामशाला विकसित करने का प्रस्ताव नागरिकों ने रखा है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी हवाला
नागरिकों ने अपने आवेदन में सार्वजनिक स्थानों पर अनधिकृत धार्मिक निर्माण से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला दिया है। 29 सितंबर 2009 के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक सड़कों, सार्वजनिक पार्कों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर मंदिर, चर्च, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि के नाम पर अनधिकृत निर्माण की अनुमति नहीं देने का निर्देश दिया था। पहले से मौजूद ऐसी संरचनाओं की समीक्षा भी मामले-दर-मामले करने को कहा गया था।
इसलिए Survey No. 103 की जमीन का वास्तविक स्वामित्व, भूमि का रिकॉर्ड, विकास योजना में उसका दर्ज उपयोग तथा प्रस्तावित निर्माण की वैधानिक अनुमति जैसे सवाल अब महत्वपूर्ण हो गए हैं। इन तथ्यों की पुष्टि संबंधित सरकारी अभिलेखों और नगर परिषद के रिकॉर्ड से होना बाकी है।
अब प्रशासन के सामने असली परीक्षा
दो पत्रों के बाद नजर अब नगर परिषद के संबंधित अधिकारियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका पर है। नागरिकों की ओर से सवाल उठाया गया है कि इस मामले में टाउन प्लानिंग अधिकारी, बांधकाम विभाग के अधिकारी/इंजीनियर, संबंधित सुपरवाइजर, मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, बांधकाम सभापति, नियोजन सभापति तथा प्रभाग क्रमांक 3 के नगरसेवक और नगरसेविका किस प्रकार मामले की जांच और समाधान की दिशा में आगे बढ़ते हैं।
मामला केवल जमीन के उपयोग का नहीं, बल्कि नगर नियोजन, सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण, धार्मिक संवेदनशीलता और स्थानीय कानून-व्यवस्था से भी जुड़ सकता है। ऐसे में प्रशासन के लिए किसी भी निर्णय से पहले सभी पक्षों को सुनना, रिकॉर्ड की जांच करना और लागू नियमों के अनुसार निर्णय लेना महत्वपूर्ण होगा।
राजनीतिक हस्तक्षेप की भूमिका भी रहेगी चर्चा में
घुग्घूस की स्थानीय राजनीति में नगर परिषद से जुड़े विकास और जनहित के मुद्दे लगातार चर्चा में रहे हैं। ऐसे में Survey No. 103 का मुद्दा आगे बढ़ने पर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी स्वाभाविक रूप से चर्चा में आएगी।
सवाल यह नहीं होना चाहिए कि किस समुदाय की मांग को प्राथमिकता मिले; मूल सवाल यह है कि Survey No. 103 की कानूनी और प्रशासनिक स्थिति क्या है और उसका उपयोग किस उद्देश्य के लिए निर्धारित है? यदि भूमि सार्वजनिक उपयोग के लिए है, तो उसके उपयोग में बदलाव के लिए कौन-सी प्रक्रिया लागू होती है और क्या सभी आवश्यक अनुमतियां उपलब्ध हैं—इन सवालों का जवाब दस्तावेजों के आधार पर सामने आना चाहिए।
क्या मामला आंदोलन की ओर जाएगा?
नागरिकों के दो लगातार पत्रों के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नगर परिषद प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है। यदि समय रहते स्थिति स्पष्ट की जाती है और नागरिकों की आपत्तियों पर सुनवाई होती है, तो विवाद को प्रशासनिक स्तर पर सुलझाने का रास्ता खुल सकता है।
वहीं, नागरिकों के बीच यह चर्चा भी शुरू हो सकती है कि यदि उनकी मांग पर कार्रवाई नहीं हुई तो वे आगे किस लोकतांत्रिक और कानूनी माध्यम का सहारा लेंगे। आमरण अनशन जैसे कदम की ओर जाने के बजाय पहले प्रशासनिक सुनवाई, लिखित जवाब, दस्तावेजों की मांग और वैधानिक शिकायत की प्रक्रिया का उपयोग करना अधिक महत्वपूर्ण होगा।
अब तीन सवाल सबसे अहम
पहला—Survey No. 103 की वास्तविक कानूनी स्थिति क्या है?
दूसरा—क्या बुद्ध विहार निर्माण के लिए वास्तव में कोई आवेदन प्रस्तुत हुआ है और उसकी वर्तमान स्थिति क्या है?
तीसरा—यदि जमीन सार्वजनिक उपयोग की है, तो क्या नगर परिषद इसे गार्डन, वॉकिंग ट्रैक और ओपन जिम के रूप में विकसित करने पर विचार करेगी?
16 सितंबर और 22 सितंबर को दिए गए दो पत्रों के बाद अब गेंद नगर परिषद प्रशासन के पाले में है। आने वाले दिनों में प्रशासनिक निर्णय, नगर परिषद की भूमिका और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि Survey No.103 का विवाद संवाद और नियमों के जरिए सुलझता है या आगे किसी बड़े नागरिक आंदोलन का रूप लेता है।




