Thursday, May 21, 2026

Breathe of Life Multipurpose Society UCO BANK- A/C- 09110110049020, IFSC : UCBA0000911, MICR CODE : 442028501

spot_img
spot_img

भूमिगत नालियों के मुद्दे पर घिरता सत्ता पक्ष, जनता पूछ रही — पहला साल, काम कितना हुआ?

वादों की नालियां या कागज़ी विकास?

प्रणयकुमार बंडी

घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनाव आते ही राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा जनता के सामने आकर्षक “जाहिरनामा” प्रस्तुत किया जाता है। विकास, स्वच्छता, सड़क, पानी और मूलभूत सुविधाओं के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद वही वादे धीरे-धीरे फाइलों, बैठकों और भाषणों तक सीमित रह जाते हैं — ऐसी चर्चा अब आम नागरिकों में खुलकर होने लगी है। साल 2025 के चुनावी जाहिरनामे में सत्ता पक्ष द्वारा 37 मुद्दों का उल्लेख किया गया था। उनमें से चौथा महत्वपूर्ण मुद्दा था — “संपूर्ण शहरात भूमिगत नाल्या व गटारीची व्यवस्था केल्या जाईल.”

अब सवाल यह उठ रहा है कि इस घोषणा का जमीनी स्तर पर कितना अमल हुआ?

नगर परिषद क्षेत्र के 11 प्रभागों में चुनाव से पहले ही कई नालियों और विकास कार्यों का भूमिपूजन किया गया था। फिलहाल वही पुराने काम जारी दिखाई दे रहे हैं। नए प्रकल्पों का भूमिपूजन कब होगा? नई नालियों का काम कब शुरू होगा? इसको लेकर नागरिकों में प्रतीक्षा और नाराजगी दोनों बढ़ती दिखाई दे रही हैं।

कई प्रभागों में सड़कें तो बनाई गईं, लेकिन नालियों का निर्माण आज भी अधूरा या गायब बताया जा रहा है। बरसात के समय गंदा पानी, कीचड़ और सफाई की समस्या सबसे अधिक महिलाओं और सामान्य परिवारों को झेलनी पड़ती है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि “सड़क बनाकर फोटो खिंचवाना आसान है, लेकिन नालियों की वास्तविक व्यवस्था करना प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की असली परीक्षा होती है।”

जनता में यह भी चर्चा है कि नगर परिषद कार्यालय के कई अधिकारी केवल एसी केबिन, कूलर और कागजी रिपोर्टों तक सीमित होकर “सब कुछ ठीक” दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि जमीनी हकीकत अलग कहानी बयान कर रही है।
मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, स्वच्छता सभापति, बांधकाम सभापति, इंजीनियर और सुपरवाइजर की जिम्मेदारी केवल फाइलों पर हस्ताक्षर करना नहीं, बल्कि क्षेत्र में जाकर कामों की वास्तविक स्थिति देखना भी है — ऐसी मांग अब तेज हो रही है।

कानूनी रूप से देखा जाए तो नगर परिषद प्रशासन पर नागरिक सुविधाओं की जिम्मेदारी तय होती है। यदि किसी विकास कार्य का सार्वजनिक वादा किया जाता है, तो जनता को उसकी प्रगति की जानकारी देना भी प्रशासनिक पारदर्शिता का हिस्सा माना जाता है। लेकिन यदि घोषणाएं केवल राजनीतिक भाषण बनकर रह जाएं, तो जनता का विश्वास कमजोर होना स्वाभाविक है।

सबसे बड़ा सवाल अब यह खड़ा हो रहा है कि सत्ता पक्ष अपने पहले साल में नई नालियों के कितने काम शुरू कर पाया? कितने प्रस्ताव मंजूर हुए? कितने कार्य पूर्ण हुए? और कितने केवल कागजों में सीमित हैं?

कुछ नागरिकों द्वारा यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या विकास कार्य “फंड के अभाव” में ऑक्सीजन पर हैं? यदि निधि की समस्या है, तो जनता के सामने वास्तविक स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं रखी जा रही?

राजनीति में वादे करना आसान माना जाता है, लेकिन उन वादों को जमीन पर उतारना ही जनप्रतिनिधियों की असली जवाबदेही होती है। आने वाला दूसरा साल यह तय करेगा कि जाहिरनामे का चौथा मुद्दा वास्तव में विकास का रोडमैप था या केवल चुनावी जुमलेबाजी।

अब देखना होगा कि आने वाले वर्षों में जनता के सवालों का जवाब विकास देगा या राजनीति। क्योंकि आखिरकार पांच साल का कार्यकाल भाषणों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले कामों से तय होता है।

spot_img

Pranaykumar Bandi

WhatsApp No - 9112388440
WhatsApp No - 9096362611
Email id: vartamanvarta1@gmail.com

RELATED ARTICLES
Today News

Breaking News

Crime News