घुग्घुस में “फेक अर्ज” विवाद से मचा हड़कंप, निष्पक्ष जांच की मांग तेज
प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : घुग्घुस नगरपरिषद कार्यालय में एक कथित “फेक शिकायत अर्ज” को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। दिनांक 20 मई 2026 को प्रशांत जवाडे को नगरपरिषद घुग्घुस के मुख्याधिकारी निलेश रांजणकर द्वारा एक नोटिस जारी किया गया, जिसमें सार्वजनिक रास्ते पर कथित रूप से रखा गया सामान हटाकर मार्ग मोकळा करने के निर्देश दिए गए थे। लेकिन इस नोटिस के संदर्भ में जिस अर्ज का उल्लेख किया गया, उसी ने अब पूरे मामले को राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद में बदल दिया है।
नोटिस में स्पष्ट रूप से “किरण बेसकर व इतर 26 इनके अर्ज दिनांक 27/03/2026” का संदर्भ दिया गया था। नोटिस के अनुसार संबंधित स्थान पर रखा गया सामान सार्वजनिक मार्ग में बाधा उत्पन्न कर रहा था, जिससे वाहनों की आवाजाही प्रभावित हो रही थी। नगरपरिषद प्रशासन ने महाराष्ट्र नगर परिषद, नगर पंचायत व औद्योगिक अधिनियम 1965 के नियमों का हवाला देते हुए कार्रवाई की चेतावनी भी दी।
मगर इस पूरे मामले में नया मोड़ तब आया जब किरण बेसकर नाम की महिला अपने वार्ड के महिला और पुरुष नागरिकों के साथ नगरपरिषद कार्यालय पहुंची और अपने नाम से किसी भी प्रकार का शिकायत अर्ज देने से इनकार किया। महिला ने आरोप लगाया कि उसके नाम का “फेक अर्ज” जानबूझकर तैयार कर प्रशासन को दिया गया। इस दौरान मुख्याधिकारी कार्यालय में उपस्थित नहीं थे।
किरण बेसकर व अन्य 6 लोगों ने नगरपरिषद कार्यालय में लिखित अर्ज देकर कथित फर्जी शिकायत की निष्पक्ष जांच की मांग की। नाराज नागरिकों ने बिना किसी का नाम लिए एक नगर सेविका और उसके पति पर संशय व्यक्त किया तथा कहा कि यदि जांच में कोई दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।
अब इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि अर्ज फर्जी था, तो नगरपरिषद प्रशासन ने बिना जांच के नोटिस कैसे जारी कर दिया? और यदि प्रशासन ने जांच के बाद ही नोटिस दिया, तो फिर संबंधित महिला ने खुद नगरपरिषद में फेक शिकायत होने का आवेदन क्यों दिया?
शहर में अब यह मामला चर्चा का केंद्र बन चुका है। नागरिकों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या नगरपरिषद कार्यालय राजनीतिक दबाव में काम कर रहा है? क्या किसी व्यक्तिगत या राजनीतिक दुश्मनी के चलते नागरिकों के नाम का इस्तेमाल कर शिकायतें की जा रही हैं? और क्या प्रशासन ऐसे मामलों में दस्तावेजों की सत्यता की जांच किए बिना कार्रवाई कर रहा है?
राजनीतिक गलियारों में भी इस मामले को लेकर हलचल तेज हो गई है। विरोधी गुट इसे “फेक कंप्लेंट पॉलिटिक्स” का उदाहरण बता रहे हैं, जबकि नागरिक प्रशासन से पारदर्शी जांच की मांग कर रहे हैं। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि मुख्याधिकारी निलेश रांजणकर इस पूरे प्रकरण में कौन-सा एक्शन मोड अपनाते हैं — क्या फर्जी अर्ज की निष्पक्ष जांच होगी, या मामला केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा?




