प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनाव आते ही राजनीतिक दलों द्वारा जनता के सामने विकास के बड़े-बड़े दावे और आकर्षक “जाहिरनामा” पेश किए जाते हैं। वर्ष 2025 के चुनावी माहौल में भी एक सत्ता पक्ष द्वारा 37 आकर्षक मुद्दों वाला जाहिरनामा प्रकाशित किया गया था, जिसमें जनता से अपील की गई थी कि अधिकृत उम्मीदवारों को भारी बहुमत से विजयी बनाएं। इसी जाहिरनामे के 9वें मुद्दे में दावा किया गया था — “प्रदूषणाला कारणीभूत असलेली रेल्वे सायडिंग हटवण्यात येईल” यानी प्रदूषण का कारण बन रही रेलवे सायडिंग को हटाया जाएगा।
लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह वादा जमीन पर कहीं दिखाई देता है, या फिर यह भी चुनावी भाषणों और कागजी राजनीति तक सीमित रह गया है?
नगर परिषद क्षेत्र के प्रभाग क्रमांक 3, 5, 6, 7, 8, 9 और 10 में रहने वाले हजारों नागरिक वर्षों से रेलवे सायडिंग और वहां लगातार आने-जाने वाले भारी वाहनों से उड़ने वाले कोयला और धूल प्रदूषण से परेशान हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रदूषण नियंत्रण के दावे सिर्फ सरकारी फाइलों और बैठकों तक सीमित हैं, जबकि जमीनी हकीकत बेहद भयावह है।
क्षेत्र में पेड़ों के पत्ते हरे कम और काले अधिक दिखाई देते हैं। घरों की सफाई करना मानो रोज की मजबूरी बन गई है। लोग कहते हैं कि चाहे कितनी भी सफाई कर लो, कुछ ही देर में धूल और कालापन फिर लौट आता है। भीषण गर्मी में सड़कों पर किया जाने वाला पानी छिड़काव भी महज दिखावा साबित हो रहा है, क्योंकि जमीन पर गिरा पानी कुछ ही मिनटों में सूख जाता है।
दूसरी ओर शहर में पेयजल संकट भी लगातार गहराता जा रहा है। कई इलाकों में चार-चार दिन बाद नल में पानी आने से आम नागरिक त्रस्त हैं। लोगों का आरोप है कि नगर परिषद प्रशासन और संबंधित विभाग मूल समस्याओं पर गंभीरता से काम करने के बजाय केवल औपचारिकता निभाने में व्यस्त हैं।
स्थानीय नागरिकों का साफ कहना है कि WCL, नगर परिषद और संबंधित प्रशासनिक विभागों की निष्क्रियता का खामियाजा सीधे आम जनता भुगत रही है। प्रदूषण नियंत्रण मंडल (MPCB) के नियमों का पालन कागजों में जरूर दिखाई देता है, लेकिन जमीन पर हालात इसके बिल्कुल उलट नजर आते हैं।
शहर में यह चर्चा भी तेज है कि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की भूमिका अब केवल एसी केबिनों, कूलर और बैठकों तक सीमित होकर रह गई है। कलेक्टर, तहसीलदार, नगर परिषद के मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, सभापति, इंजीनियर और सुपरवाइजर स्तर तक सब कुछ “नियंत्रण में” होने की रिपोर्ट तैयार कर दी जाती है, लेकिन जनता जिस जहरीली हवा में जी रही है, उसका वास्तविक आकलन कौन करेगा — यह बड़ा सवाल बन चुका है।
नागरिकों का कहना है कि यदि रेलवे सायडिंग वास्तव में प्रदूषण का मुख्य कारण है, तो उसे हटाने को लेकर पहले वर्ष में कौन-सी ठोस कार्रवाई हुई? क्या कोई समयसीमा तय की गई? क्या किसी विभागीय बैठक में निर्णय लिया गया? और यदि नहीं, तो फिर जनता से किया गया यह वादा आखिर किस आधार पर किया गया था?
अब सवाल केवल एक वादे का नहीं, बल्कि नगर परिषद की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक जवाबदेही और कानूनी व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी है। जनता पूछ रही है कि क्या नियम सिर्फ आम लोगों के लिए हैं और बड़े प्रदूषणकारी तंत्र पर कार्रवाई केवल भाषणों तक सीमित रहेगी?
फिलहाल “प्रदूषणाला कारणीभूत असलेली रेल्वे सायडिंग हटवण्यात येईल” यह वादा पहले वर्ष में कितना सफल हुआ है, इसका जवाब आने वाले समय में जनता जरूर मांगेगी। अब देखना यह होगा कि आने वाले वर्षों में जमीनी कार्रवाई दिखाई देती है या फिर यह मुद्दा भी चुनावी जुमलेबाजी बनकर फाइलों में दफन हो जाएगा।
पार्ट.9…




