(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घुस, चंद्रपुर | 31 दिसंबर 2025 को दोपहर करीब 3.30 बजे घुग्घुस टी-प्वाइंट (धानोरा फाटा) पर हुई भीषण सड़क दुर्घटना ने एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही और यातायात व्यवस्था की पोल खोल दी। इस दर्दनाक हादसे में बार्बर शॉप के मालिक शंकर जुनारकर की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि चाय टपरी संचालक अमर महादेव झोड़े (24) गंभीर रूप से घायल हो गया। इसके अलावा सड़क किनारे खड़ी गाड़ी को कुचलने से अजय राठोड़ (49), प्रियंका राठोड़ (32) और ओवी राठोड़ (16) भी गंभीर रूप से घायल हुए हैं, जिनका इलाज अस्पताल में जारी है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार सीमेंट से भरा बलकर वाहन (MP 11 ZD 0931) तेज रफ्तार में पहले एक कार (MH 34 BV 8861) को पीछे से टक्कर मारते हुए भागने की कोशिश करता रहा। इसी दौरान धानोरा फाटा पर सड़क किनारे खड़ी कार (MH 34 AA 0051) को जोरदार टक्कर मारकर बलकर अनियंत्रित हो गया और सड़क से कुछ दूरी पर स्थित बार्बर शॉप व चाय टपरी को रौंद डाला। यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि खुलेआम नियमों की अनदेखी और कमजोर निगरानी का नतीजा है।
घटना के बाद इलाके में भारी आक्रोश फैल गया। 1 जनवरी 2026 को पीड़ित परिवार, स्थानीय नेता और आम नागरिक पहले न्याय की गुहार लगाने घुग्घुस पुलिस स्टेशन पहुंचे। जब ठोस आश्वासन नहीं मिला, तो लोगों ने धानोरा फाटा पर करीब तीन घंटे तक चक्काजाम कर दिया। दबाव के बाद देर शाम मृतक के परिवार को 10 लाख रुपये और घायल चाय टपरी संचालक के परिवार को 1 लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की गई। लेकिन सवाल यह है कि कार में सवार घायल परिवार को कोई स्पष्ट आश्वासन क्यों नहीं मिला? क्या न्याय मुआवजे की सूची तक ही सीमित रह गया है?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि गड़चांदूर–चंद्रपुर मार्ग पर भारी वाहनों की तेज रफ्तार, ओवरलोडिंग और नियमों की खुलेआम अनदेखी कोई नई बात नहीं है। वर्षों से लोग चेतावनी देते आ रहे हैं, लेकिन न तो पुलिस की सख्ती दिखती है और न ही प्रशासन की दूरदृष्टि। हादसे के बाद कुछ दिनों की औपचारिक कार्रवाई होती है, फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आता है।
इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या प्रशासन किसी और जान के जाने का इंतजार कर रहा है? क्या धानोरा फाटा जैसे संवेदनशील स्थानों पर स्थायी सुरक्षा इंतजाम, स्पीड कंट्रोल, भारी वाहनों पर निगरानी और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए?
घुग्घुस पुलिस ने शिकायत दर्ज कर जांच शुरू कर दी है, लेकिन जनता अब सिर्फ जांच नहीं, ठोस और स्थायी समाधान चाहती है। क्योंकि हर हादसे के बाद उठने वाला आक्रोश तब तक खत्म नहीं होगा, जब तक सड़कों पर कानून का डर और प्रशासन की जिम्मेदारी साफ नजर नहीं आएगी।




