Friday, May 29, 2026

Breathe of Life Multipurpose Society UCO BANK- A/C- 09110110049020, IFSC : UCBA0000911, MICR CODE : 442028501

spot_img
spot_img

“गरीब” कौन और “करीब” का दिखावा – समाज की एक विडंबना पर आलोचनात्मक दृष्टि

(प्रणयकुमार बंडी)

आज के दौर में “गरीबी” केवल आर्थिक स्थिति का शब्द नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक विमर्श का विषय बन चुका है। परंतु एक दूसरी विडंबना भी समाज में तेजी से उभर रही है — “करीब होने का नाम लेकर जीने वाले लोग”। यह वह वर्ग है जो स्वयं को आम जनता के निकट, गरीबों का हितैषी और जनसेवक बताता है, लेकिन व्यवहार में उनकी जीवनशैली, निर्णय और प्राथमिकताएँ इससे बिल्कुल विपरीत दिखाई देती हैं।

गरीब कौन?

परंपरागत रूप से गरीब उस व्यक्ति को कहा जाता है जिसके पास भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव हो। परंतु आज के समय में “गरीबी” केवल पैसों की कमी नहीं, बल्कि अवसरों की कमी, शिक्षा की कमी और सामाजिक सम्मान की कमी भी है।
एक व्यक्ति आर्थिक रूप से सक्षम हो सकता है, लेकिन यदि वह समाज में असुरक्षित, उपेक्षित और असमान अवसरों का शिकार है, तो वह भी एक प्रकार की गरीबी का सामना कर रहा है।

“करीब” होने का दावा

राजनीति, सामाजिक संस्थाओं और सार्वजनिक मंचों पर अक्सर यह देखा जाता है कि कई लोग खुद को “गरीबों के करीब” बताकर अपनी छवि गढ़ते हैं। वे साधारण वेशभूषा, भाषणों में संवेदनशील शब्दों और दिखावटी व्यवहार के माध्यम से जनता का विश्वास जीतने की कोशिश करते हैं।
लेकिन आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो यह “करीब” होना अक्सर केवल एक रणनीति बनकर रह जाता है — वास्तविक जुड़ाव नहीं।

दिखावा बनाम वास्तविकता

ऐसे लोगों की आलोचना इसलिए होती है क्योंकि— वे गरीबों के नाम पर योजनाएँ और घोषणाएँ करते हैं, पर जमीनी स्तर पर परिणाम कम दिखते हैं। उनके निजी जीवन की विलासिता और सार्वजनिक मंचों की सादगी में स्पष्ट अंतर होता है। वे सहानुभूति का प्रदर्शन करते हैं, पर समाधान की ठोस पहल कम करते हैं।

इस व्यवहार को समाज में कई बार “दिखावटी जनसेवा”, “छवि राजनीति” या “संवेदनात्मक ब्रांडिंग” कहा जाता है। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब वास्तविक जरूरतमंदों की समस्याएँ केवल भाषणों तक सीमित रह जाती हैं।

सामाजिक प्रभाव

इस प्रवृत्ति का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि जनता का भरोसा धीरे-धीरे कमजोर होता है। जब बार-बार “करीब” होने का दावा झूठा साबित होता है, तो लोग असली मददगारों पर भी संदेह करने लगते हैं। इससे सामाजिक संवेदनशीलता कम होती है और वास्तविक गरीबों की आवाज़ दब जाती है।

गरीब वह नहीं जो केवल पैसों से वंचित है, बल्कि वह भी गरीब है जो अवसरों और सम्मान से वंचित है। वहीं, “करीब होने का नाम लेकर जीने वाले” वे लोग हैं जो निकटता का प्रदर्शन तो करते हैं, परंतु दूरी बनाए रखते हैं।
समाज के लिए चुनौती यही है कि वह दिखावे और वास्तविक सेवा के बीच अंतर पहचान सके। जब तक “करीब” होना व्यवहार में नहीं उतरेगा, तब तक यह शब्द केवल एक मुखौटा बनकर रह जाएगा।

spot_img

Pranaykumar Bandi

WhatsApp No - 9112388440
WhatsApp No - 9096362611
Email id: vartamanvarta1@gmail.com

RELATED ARTICLES
Today News

Breaking News

Crime News