(प्रणयकुमार बंडी)
चंद्रपुर (घुग्घुस) : शहर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में एक बड़ी मेटल्स एंड एनर्जी कंपनी का विस्तार कार्य इन दिनों तेजी से जारी है। कंपनी के इस विस्तार को लेकर प्रशासनिक स्तर पर आवश्यक अनुमतियां और एनओसी मिलने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। वहीं दूसरी ओर विभिन्न राजनीतिक दलों के कुछ नेताओं द्वारा इस परियोजना को खुला समर्थन दिए जाने की चर्चा भी जोरों पर है।
हालांकि, स्थानीय स्तर पर इस विस्तार कार्य को लेकर कई गंभीर सवाल भी उठने लगे हैं। आरोप है कि कंपनी के विस्तार के नाम पर किसानों की जमीन, पानधन मार्ग (पैदल/ग्रामीण मार्ग) तथा प्राकृतिक नाले और नालियों पर भी अधिकार जताने की कोशिश की जा रही है। इन मार्गों पर तेजी से निर्माण कार्य किए जाने की खबरों ने ग्रामीणों और किसानों में चिंता बढ़ा दी है।
स्थानीय युवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रभावित किसानों ने इस पूरे मामले की तीखी आलोचना करते हुए इसे जनहित और किसानों के अधिकारों के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि औद्योगिक विकास जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर किसानों की जमीन, सार्वजनिक रास्ते और प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था पर कब्जा किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सूत्रों के अनुसार, इस विस्ताराधीन परियोजना में घुग्घुस, नकोडा, उसगांव, शेनगांव और पांडरकवडा सहित चंद्रपुर जिले के अलावा महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के ठेकेदार बड़े पैमाने पर काम कर रहे हैं। चर्चा यह भी है कि कई स्थानीय जनप्रतिनिधियों—जिनमें सरपंच, ग्राम पंचायत सदस्य, नगरसेवक, सभापति, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और तालुका व जिला स्तर के पदाधिकारी शामिल हैं—के परिवार या रिश्तेदारों के नाम पर लेबर सप्लाई, मटेरियल सप्लाई, कॉन्ट्रैक्ट और पेटी कॉन्ट्रैक्ट दिए जाने का सिलसिला चल रहा है।
इससे पूरे मामले में पारदर्शिता और निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ नेताओं और अधिकारियों की भूमिका पर्दे के पीछे से काम करने की बताई जा रही है, जिससे जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है।
इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए स्थानीय युवा नेता राजेश उर्फ चांद मोरपाका ने कहा कि कोई भी विकास कार्य तभी स्वीकार्य है जब वह पूरी तरह जनहित में हो।
उन्होंने कहा,
“विकास का मतलब यह नहीं कि किसानों के हक छीन लिए जाएं या आम जनता के रास्ते और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा कर लिया जाए। उद्योग जरूरी है, लेकिन कानून और जनहित से ऊपर कोई नहीं हो सकता।”
उन्होंने आगे बताया कि इस पूरे मामले को लेकर संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को लिखित पत्र दिया जाएगा। यदि अधिकारियों की ओर से संतोषजनक और सकारात्मक जवाब नहीं मिलता, तो किसानों और आम जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन भी किया जाएगा।
कानूनी जानकारों के अनुसार, किसी भी औद्योगिक परियोजना के विस्तार के लिए भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण संरक्षण, जल निकासी व्यवस्था और सार्वजनिक मार्गों से जुड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। यदि इन नियमों की अनदेखी कर निर्माण कार्य किया जाता है, तो यह औद्योगिक और राजस्व कानूनों का उल्लंघन माना जा सकता है।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कर किसानों और जनता के अधिकारों की रक्षा करता है या फिर यह विवाद आने वाले दिनों में बड़े जनआंदोलन का रूप ले लेता है।




