(प्रणयकुमार बडी)
घुग्घुस में भूमि माफियाओं का खेल चरम पर है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे हुए हैं। नोटरी के आड़ में पूरे घुग्घुस की जनता को जाल में फंसाया गया है। कई पीड़ितों ने अपनी शिकायतें घुग्घुस नगर परिषद कार्यालय में जमा की हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनका कोई अता-पता नहीं है, फिर भी उनकी जमीन पर कब्जा हो चुका है।
कहीं दीवारें खड़ी कर दी गई हैं, कहीं पक्के मकान बना दिए गए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिन्होंने जमीन ली, उनका पता नहीं; जिन्होंने बेची, उनका पता नहीं; और जो असली मालिक हैं, उन्हें मालूम ही नहीं कि उनकी जमीन कहां गई और उस पर कौन रह रहा है।
स्थिति यह है कि वास्तविक जमीन मालिक हक के लिए दर-दर भटक रहे हैं, जबकि अधिकारी नियम-कायदे की लंबी-चौड़ी व्याख्या में ही लगे हुए हैं। कागजों में सबकुछ सही दिखाया जा रहा है, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही है।
मामले में आशावरकर और आंगनवाड़ी सेविकाओं की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय नेताओं पर भी आरोप है कि वे जनता की परेशानी दूर करने के बजाय अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस मुद्दे को भुनाने में व्यस्त हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि जल्द ही इस पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो घुग्घुस की जमीनों पर अवैध कब्जे का यह सिलसिला थमना मुश्किल होगा और असली मालिक अपने ही हक से हमेशा के लिए वंचित हो जाएंगे।





