(प्रणयकुमार बंडी)
चंद्रपुर (महाराष्ट्र) – 26 अगस्त 2022… तारीख़ भले ही कैलेंडर में पीछे छूट गई हो, लेकिन घुग्घुस के अमराई वार्ड के 169 परिवारों के लिए यह दिन आज भी जख़्म की तरह ताज़ा है। जिस दिन ज़मीन ने घर निगल लिया और लोगों की ज़िंदगियाँ उजड़ गईं। तीन साल बीत गए… नेता आए, फोटो खिंचवाए, बयान दिए और फिर लौट गए। सवाल वही खड़ा है – घर कब मिलेगा?
क्या यह सच नहीं कि नेताओं की जिम्मेदारी सिर्फ़ शोक व्यक्त करने और आश्वासन देने तक ही सीमित रह गई है?
क्या गरीबों का जीवन इतना सस्ता है कि उन्हें तीन-तीन साल तक बेघर भटकाया जाए?
क्या प्रशासन की फाइलों का वजन इंसानी दुखों से ज्यादा भारी है?
वेकोलि (WCL) पर आरोप लगे कि खदानें बंद करते वक्त लापरवाही हुई, लेकिन कार्रवाई आज तक कागज़ों से बाहर क्यों नहीं आई?
मुख्यमंत्री सहायता निधि से 10 हज़ार रुपये बांटे गए – क्या तीन साल का दर्द इस मामूली रकम से मिट सकता है?
नेता तब आए थे जब कैमरे चालू थे, आज जब जनता भूख और बेघरपन से जूझ रही है तो सब खामोश क्यों हैं?
मुंबई मंत्रालय की हालिया बैठक में चंद्रपुर-घुग्घुस पट्टों का सर्वेक्षण कर छह महीने में पट्टे देने का आदेश हुआ, घुग्घुस को अप्पर तहसील का तोहफ़ा भी मिला, खेल मैदान की ज़मीन का भी हल निकला। लेकिन बड़ा सवाल – भूस्खलन पीड़ितों की सुध कब ली जाएगी?
अगर हादसा मुंबई या पुणे में हुआ होता तो क्या सरकार इतनी बेरुख़ी दिखाती?
क्या राजनीति सिर्फ़ घोषणाओं, बैठकों और फोटोशूट तक सिमट कर रह गई है?
क्या 169 परिवारों का दर्द नेताओं के लिए महज़ वोट बैंक की गिनती है?
तीन साल से यह परिवार छत की आस में हैं –
नेता ‘वादे’ करते हैं,
अधिकारी ‘बैठक’ करते हैं,
जनता ‘प्रतीक्षा’ करती है।
लेकिन न्याय?
वह अब भी “आएगा, आएगा” के वादे में टलता जा रहा है।
घुग्घुस भूस्खलन पीड़ितों का यह मामला सिर्फ़ पुनर्वास का नहीं, बल्कि सत्ता की संवेदनहीनता का आईना है। और यही सवाल अब जनता पूछ रही है –
“आख़िर कब तक नेताओं के वादे, प्रशासन की चुप्पी और गरीबों की मजबूरी ऐसे ही चलती रहेगी?”





