प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : सोमवार, 15 जून 2026 को शाम करीब 5 बजे हुई एक सड़क दुर्घटना ने नगर परिषद की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक जवाबदेही और स्थानीय राजनीति को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों के अनुसार इस हादसे में एक युवक गंभीर रूप से घायल हुआ और उसका पैर टूट गया। गनीमत रही कि युवक की जान बच गई, अन्यथा यह घटना और भी भयावह रूप ले सकती थी।
दुर्घटना के बाद घटनास्थल पर पुलिस के साथ नगर परिषद कार्यालय के इंजीनियर, बाबू, चपरासी तथा अन्य कर्मचारियों की मौजूदगी चर्चा का विषय बन गई। स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर एक सड़क दुर्घटना के तुरंत बाद नगर परिषद के इतने अधिकारी और कर्मचारी घटनास्थल पर क्यों पहुंचे? क्या यह केवल औपचारिकता थी या फिर किसी बड़े मामले को संभालने की कोशिश?
घटना के बाद क्षेत्र में यह चर्चा भी तेजी से फैल गई कि जिस जेसीबी मशीन का नाम इस प्रकरण में सामने आ रहा है, उसका संबंध एक नगरसेवक और सभापति से बताया जा रहा है। वहीं यह भी कहा जा रहा है कि मशीन किसी फर्म के नाम पर पंजीकृत है। हालांकि खबर लिखे जाने तक इस संबंध में कोई आधिकारिक दस्तावेज, पुष्टि या संबंधित पक्ष का बयान सामने नहीं आया है।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि पूरे मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। यदि यह केवल एक सामान्य दुर्घटना है, तो फिर तथ्यों को सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों? घायल युवक और उसके परिवार को न्याय दिलाने के बजाय यदि पर्दा डालने की कोशिश हो रही है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता दोनों पर प्रश्नचिह्न है।
जनता के बीच यह मांग भी उठ रही है कि दुर्घटना की निष्पक्ष जांच हो, वाहन और उसके स्वामित्व की पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए तथा यह स्पष्ट किया जाए कि हादसे के लिए जिम्मेदार कौन है। घायल युवक के इलाज का खर्च कौन उठाएगा? उसके परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ने वाले प्रभाव की भरपाई कैसे होगी? यदि वह लंबे समय तक काम नहीं कर पाया तो उसके घर का खर्च कैसे चलेगा? इन सवालों के जवाब अभी तक अनुत्तरित हैं।
इस पूरे मामले में विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अक्सर जनहित और जवाबदेही की बात करने वाले विपक्षी दल क्या इस मुद्दे को मजबूती से उठाएंगे या फिर यह मामला भी राजनीतिक समीकरणों की भेंट चढ़ जाएगा? जनता की नजरें अब विपक्ष पर भी टिकी हुई हैं।
यह घटना केवल एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता, नगर परिषद की जवाबदेही और राजनीतिक नैतिकता की भी परीक्षा है। यदि जिम्मेदारों को बचाने और पीड़ित को भुलाने की कोशिश हुई, तो यह व्यवस्था पर जनता के भरोसे को और कमजोर करेगा। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि सच्चाई सामने आती है या फिर यह मामला भी फाइलों और चर्चाओं में दबकर रह जाता है।




