प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : घुग्घुस नगर परिषद क्षेत्र में …मेटल एंड एनर्जी लिमिटेड को प्रस्तावित निर्माण अनुमति के मामले ने अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया का स्वरूप नहीं रखा है, बल्कि यह मामला पारदर्शिता, जनभागीदारी और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहा है।
नगर परिषद द्वारा 30 अप्रैल 2026 को जारी सार्वजनिक सूचना में नागरिकों से आपत्तियां मांगी गई थीं, लेकिन शहर में यह चर्चा जोरों पर है कि ऐसी महत्वपूर्ण सूचना की जानकारी आम नागरिकों तक प्रभावी ढंग से पहुंची ही नहीं। कई नागरिकों का कहना है कि यदि वास्तव में जनता की राय जानना उद्देश्य था, तो नगर परिषद को सार्वजनिक उद्घोषणा (लाउडस्पीकर), वार्ड स्तर की सूचना व्यवस्था और अन्य माध्यमों का उपयोग करना चाहिए था, ताकि हर प्रभावित व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर मिल सके।
मामले को लेकर शिवसेना (उबाठा) और आम आदमी पार्टी के स्थानीय पदाधिकारियों द्वारा दर्ज कराई गई आपत्तियों के बाद जो तथ्य सामने आए हैं, उन्होंने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर और भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सुनवाई के दौरान नागरिकों और बुद्ध विहार की ओर से किसी प्रकार की आपत्ति न होने का दावा किया गया, लेकिन स्थल निरीक्षण में इसके विपरीत स्थिति दिखाई देने का आरोप लगाया जा रहा है। यदि यह दावा सही है, तो यह केवल सूचना का अंतर नहीं बल्कि प्रशासनिक विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है।
शहर में यह भी चर्चा है कि जनता से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका स्पष्ट नजर नहीं आ रही है। आम लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि जब सार्वजनिक भूमि, मार्ग या नागरिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर निर्णय लिए जा रहे हैं, तब जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भूमिका आखिर कहां है? जनता के हितों की रक्षा करने की जिम्मेदारी किसकी है और यदि नागरिकों की आवाज नहीं सुनी जा रही है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का उद्देश्य क्या रह जाता है?
नागरिकों का कहना है कि विकास कार्यों का विरोध नहीं है, लेकिन विकास के नाम पर यदि स्थानीय लोगों की सहमति, सुविधाओं और अधिकारों को नजरअंदाज किया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं बल्कि मनमानी व्यवस्था प्रतीत होती है। प्रशासन का दायित्व केवल कागजी औपचारिकताएं पूरी करना नहीं, बल्कि प्रभावित नागरिकों को विश्वास में लेना भी है।
घुग्घुस में अब यह प्रश्न खुलकर पूछा जा रहा है कि क्या महत्वपूर्ण निर्णय जनता की जानकारी और सहमति से लिए जा रहे हैं या फिर कुछ चुनिंदा स्तरों पर तय होकर केवल औपचारिकताएं निभाई जा रही हैं? यदि नागरिकों को समय पर और व्यापक रूप से सूचना ही नहीं मिलेगी, तो आपत्ति दर्ज करने का अधिकार व्यवहारिक रूप से अर्थहीन होकर रह जाएगा।
खबर लिखे जाने तक इस पूरे मामले पर नगर परिषद प्रशासन या संबंधित अधिकारियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी। हालांकि शहर में बढ़ती चर्चाओं और उठते सवालों के बीच प्रशासन की चुप्पी भी लोगों के संदेह को और गहरा कर रही है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन जनता के सामने स्पष्ट स्थिति रखकर विश्वास बहाल करता है या फिर यह मामला आगे चलकर जनआंदोलन और राजनीतिक टकराव का रूप लेता है। फिलहाल घुग्घुस में एक ही सवाल गूंज रहा है—”जनहित के फैसले जनता की जानकारी से होंगे या हुकूमशाही और मनमानी से?”




