Wednesday, April 29, 2026

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इतिहास के पन्नों में: गणेश दामोदर सावरकर जन्म: 13 जून 1879

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कई वीर योद्धाओं में से एक प्रमुख नाम हैं गणेश दामोदर सावरकर, जिन्हें प्यार से बाबाराव सावरकर भी कहा जाता है। वे न केवल एक क्रांतिकारी थे, बल्कि एक विचारक, लेखक और संगठनकर्ता भी थे। उनका जन्म 13 जून 1879 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर गांव में हुआ था।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

गणेश सावरकर एक मध्यमवर्गीय चित्पावन ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। उनके पिता दामोदर पंत सावरकर एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति थे। गणेश बचपन से ही साहसी और तेजस्वी स्वभाव के थे। उनके दो छोटे भाई भी इतिहास में प्रसिद्ध हुए — विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) और नारायण सावरकर।

क्रांतिकारी गतिविधियाँ

गणेश दामोदर सावरकर भारत में उभरते राष्ट्रवादी आंदोलन के शुरुआती नेताओं में से थे। उन्होंने ‘अभिनव भारत’ नामक गुप्त क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की, जो युवाओं में देशभक्ति की भावना जागृत करने और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह की योजना बनाने में सक्रिय था।

साल 1909 में नासिक में कलेक्टर जैक्सन की हत्या की योजना में उनके संगठन की भूमिका पाई गई, जिसके चलते उन्हें ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। 1910 में उन्हें कालापानी (अंडमान की सेलुलर जेल) की कठोर सजा दी गई। यह वही जेल थी, जहाँ बाद में उनके छोटे भाई वीर सावरकर को भी बंद किया गया था।

लेखन और विचारधारा

बाबाराव सावरकर न केवल क्रांतिकारी थे, बल्कि उन्होंने हिंदुत्व, भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद पर कई लेख भी लिखे। वे मानते थे कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही पर्याप्त नहीं है, जब तक समाज सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी स्वतंत्र न हो।

उनका लेखन राष्ट्रवादी विचारों से ओतप्रोत होता था और युवाओं को प्रेरित करने वाला था। उन्होंने हिंदू एकता, धर्म जागरण और सामाजिक सुधार पर भी बल दिया।

उत्तरकाल और विरासत

कई वर्षों की जेल यातनाओं के बाद वे रिहा हुए और स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाते रहे। उनका स्वास्थ्य जीवन के उत्तरार्ध में काफी प्रभावित हुआ, लेकिन देशभक्ति की भावना में कोई कमी नहीं आई।

1945 में बाबाराव सावरकर का निधन हो गया, लेकिन उनके योगदान को आज भी भारत के इतिहास में एक प्रेरणास्रोत के रूप में याद किया जाता है।

गणेश दामोदर सावरकर का जीवन हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी होनी चाहिए। वे उन गिने-चुने क्रांतिकारियों में से थे जिन्होंने अपने विचारों और कार्यों से आने वाली पीढ़ियों को मार्ग दिखाया।

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Pranaykumar Bandi

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