(प्रणयकुमार बंडी)
दिवाली, जिसे ‘दीपावली’ भी कहा जाता है, भारत का एक प्रमुख और अत्यंत लोकप्रिय त्यौहार है। यह हर साल कार्तिक मास के अमावस्या (अंधेरी रात) को मनाया जाता है। दिवाली केवल रोशनी का त्यौहार नहीं है, बल्कि यह अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक भी है।
दिवाली का ऐतिहासिक संदर्भ
दिवाली का इतिहास प्राचीन भारत से जुड़ा हुआ है और इसे विभिन्न मिथकों और घटनाओं के साथ जोड़ा गया है:
रामायण के अनुसार:
उत्तर भारत में दिवाली का प्रमुख महत्व राम के अयोध्या लौटने से जुड़ा हुआ है। जब भगवान राम, माता सीता और भाई लक्ष्मण 14 वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या लौटे, तब अयोध्यावासियों ने दीपों की पट्टी से नगर को रोशन किया। यही घटना दीपावली का प्रारंभिक कारण मानी जाती है।
महाभारत और अन्य पुराणों के अनुसार:
कुछ भागों में इसे भगवान कृष्ण और नरकासुर की कथा से जोड़ा गया है। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध कर लोगों को उसकी यातनाओं से मुक्त किया। इस विजय को मनाने के लिए दीप जलाए जाते हैं।
प्राचीन व्यापारियों का महत्व:
इतिहास में, दिवाली का त्यौहार नई आर्थिक वर्ष की शुरुआत के रूप में भी मनाया जाता था। व्यापारी वर्ग इस दिन अपने खातों का नवीनीकरण करता और देवी लक्ष्मी की पूजा करके समृद्धि की कामना करता।
धार्मिक महत्व
दिवाली का धार्मिक महत्व विभिन्न समुदायों में अलग-अलग रूपों में देखा जाता है:
हिंदू धर्म में:
दिवाली पांच दिनों तक मनाई जाती है, जिनमें प्रत्येक दिन का विशेष महत्व है:
पहला दिन – वसुबरस/धनतेरस: स्वास्थ्य और धन की देवी कुबेर और धन लक्ष्मी की पूजा।
दूसरा दिन – नरक चतुर्दशी/छोटी दिवाली: बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक।
तीसरा दिन – मुख्य दिवाली: लक्ष्मी पूजन, धन और समृद्धि के लिए दीप जलाना।
चौथा दिन – गोवर्धन पूजा/अन्नकूट: प्रकृति और कृषि का सम्मान।
पाँचवा दिन – भाई दूज: भाई-बहन के संबंधों का उत्सव।
यह पर्व बुराई, अज्ञान और अंधकार पर अच्छाई, ज्ञान और प्रकाश की विजय का प्रतीक है।
जैन धर्म में:
जैन धर्म में दिवाली महावीर स्वामी की निर्वाण दिवस के रूप में मनाई जाती है। यह आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति का प्रतीक है।
सिख धर्म में:
सिखों के लिए दिवाली का महत्व आनंदपुर साहिब और लाल किला में गुरु हरगोबिंद जी के स्वतंत्रता दिवस से जुड़ा हुआ है। इसे बुराई पर धर्म की विजय के रूप में मनाया जाता है।
दिवाली के रीति-रिवाज
दिवाली का त्यौहार केवल धार्मिक महत्व तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ कई सांस्कृतिक और सामाजिक रीति-रिवाज जुड़े हुए हैं:
घरों और दुकानों की सफाई और सजावट।
दीपक और मोमबत्तियों से घरों की सजावट।
मिठाई और उपहार का आदान-प्रदान।
आतिशबाजी और पटाखों से खुशियों का प्रदर्शन।
लक्ष्मी पूजन और भगवान गणेश की पूजा।
दिवाली का सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश
अंधकार पर प्रकाश की विजय – अज्ञान, भय और बुराई पर ज्ञान और अच्छाई का प्रतीक।
संपर्क और सौहार्द्र – परिवार और समाज में भाईचारे और प्रेम का संदेश।
धन और समृद्धि – आर्थिक उन्नति और मेहनत का सम्मान।
आध्यात्मिक चेतना – आत्मा के अंधकार को दूर कर ज्ञान की ओर मार्गदर्शन।
दिवाली सिर्फ दीप जलाने या उत्सव मनाने का पर्व नहीं है, बल्कि यह जीवन के प्रत्येक पहलू में उज्ज्वलता, सौहार्द्र और नैतिकता का संदेश देता है। यह त्यौहार हमें याद दिलाता है कि हर अंधकार में प्रकाश है, हर संघर्ष में विजय है और हर कठिनाई में उम्मीद है। यही कारण है कि भारत में दिवाली का त्यौहार हमेशा हर्षोल्लास और गहरी आध्यात्मिक भावना के साथ मनाया जाता है।




