Monday, December 8, 2025

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“समाज की आंख खोलो — पत्रकार भी इंसान है, मशीन नहीं!”

(प्रणयकुमार बंडी)

“जो कलम रुक गई, तो आवाज़ें भी रुक जाएंगी।”

पत्रकार… यह वही नाम है, जो समाज के हर दर्द में सबसे पहले खड़ा दिखता है। जो जनता और शासन के बीच सेतु बनता है। जो अंधेरे में रोशनी जलाने की कोशिश करता है। लेकिन दुखद यह है कि जब वही पत्रकार थोड़ी आर्थिक मदद या एक साधारण ‘जाहिरात’ मांगता है, तब समाज आंखें फेर लेता है।

“जाहिरात मांगी कि लोग मुंह फेर लेते हैं!” — यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि हर ईमानदार पत्रकार की आज की वास्तविकता है। जो दूसरों की लड़ाई लड़ता है, जो सच के लिए सत्ता से भिड़ता है, वही जब अपने अस्तित्व की लड़ाई में उतरता है, तो सब मौन हो जाते हैं। नेता ‘व्यस्त’ हैं, व्यापारी ‘सोचेंगे’ कहकर फोन काट देते हैं, उद्योगपति ‘नीति’ का बहाना बना देते हैं। पर जब समाज पर संकट आता है, तब यही पत्रकार याद आता है —

लेकिन समाज का यह व्यवहार क्या उचित है? जो व्यक्ति हर दिन दूसरों की आवाज़ बनता है, जब वह खुद बोले तो सब खामोश क्यों हो जाते हैं? क्या पत्रकार की मेहनत, ईमानदारी और जोखिम का कोई मूल्य नहीं?

पत्रकार का काम केवल खबर लिखना नहीं है — वह समाज का दर्पण है।
पर यह दर्पण तब तक साफ़ दिखाएगा, जब तक समाज उसे साफ़ रखेगा।
अगर समाज ने ही इस दर्पण को धूल में छोड़ दिया, तो फिर किसी को सच्चाई का चेहरा दिखेगा कैसे?

त्योहारों पर, जब व्यापारी अपने मुनाफे गिनते हैं, नेता अपने पोस्टर सजाते हैं, तब पत्रकार अपने छोटे से दफ्तर में बैठा, ‘व्यस्त’ लोगों के बंद फोन सुनता है।
उसे कोई याद नहीं करता, जब तक किसी का मुद्दा न फंसे।
पर संकट आते ही सब कहते हैं —
“भाई, एक खबर चलवा दो… न्याय मिल जाए बस!”

यह दोहरा चरित्र है समाज का — जरूरत हो तो पत्रकार भगवान, और काम निकल जाए तो बोझ!

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाले पत्रकारों की हालत आज सबसे कमजोर है।
कई लोग दबाव में हैं, कई पर झूठे मुकदमे, कई की आवाज़ें दबाई जा रही हैं।
लेकिन फिर भी ये लोग लड़ रहे हैं, क्योंकि इनके पास सत्ता नहीं, धन नहीं —
बस सत्य की कलम है।

समाज से एक सीधी बात — पत्रकार जब विज्ञापन मांगता है, तो वह अपनी मेहनत का हक़ मांगता है, न कि एहसान। वह आपसे अपने काम का सम्मान चाहता है।
आप साल में एक बार ही सही, अपने स्थानीय अखबार को एक छोटा-सा विज्ञापन दें —
यकीन मानिए, वही पत्रकार पूरे साल आपके अधिकारों की ढाल बनकर खड़ा रहेगा।

जो समाज अपने पत्रकारों को कमजोर करता है, वह खुद अंधेरे में गिरता है। क्योंकि अगर कलम रुक गई — तो आवाज़ें भी रुक जाएंगी।

पत्रकारों को पैसों से ज्यादा जरूरत है — विश्वास की, समर्थन की, सम्मान की।
क्योंकि पत्रकार न बिकता है, न झुकता है, वह केवल सच्चाई के लिए जीता है।

पत्रकार की कलम कमजोर नहीं, बस समाज का समर्थन कमजोर है। उसे मजबूती दीजिए — क्योंकि वही आपकी आवाज़ है! AI वर्णित 16:9 का बिना शब्दों वाला कार्टून चित्र बनाएं.

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Pranaykumar Bandi

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