प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर: चुनाव के दौरान जारी किए गए आकर्षक घोषणापत्रों में विकास के अनेक वादे किए जाते हैं। इन्हीं वादों में एक महत्वपूर्ण मुद्दा था — “शहरातील दोन्ही तलावाच्या खोलीकरण व सौंदर्यकरण केल्या जाईल”। वर्ष 2025 के चुनावी जाहिरनामे के इस 17वें मुद्दे को शहर के जलसंकट, भूजल संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन से जोड़कर प्रस्तुत किया गया था। लेकिन चुनाव के कुछ महीने बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह वादा जमीन पर कितना उतरा है?
घुग्घुस नगर परिषद क्षेत्र के प्रभाग क्रमांक 5 और 8 में स्थित जिन दो तालाबों के खोलीकरण और सौंदर्यीकरण की बात कही गई थी, उनकी वास्तविक स्थिति आज भी चर्चा का विषय बनी हुई है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि संबंधित तालाब निजी स्वामित्व की भूमि पर स्थित हैं, तो नगर परिषद की भूमिका आखिर क्या हो सकती है?
नगर प्रशासन से जुड़े नियमों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में किसी निजी संपत्ति पर सार्वजनिक निधि खर्च नहीं की जा सकती। यदि किसी निजी तालाब पर विकास कार्य करना हो तो उसके लिए मालिक की लिखित सहमति, वैधानिक करार, सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी अथवा किसी विशेष सरकारी योजना का आधार होना आवश्यक माना जाता है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि क्या इन तालाबों के संदर्भ में कोई वैधानिक प्रक्रिया पूरी की गई है? क्या कोई समझौता हुआ है? क्या नगर परिषद के पास आवश्यक प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृतियां मौजूद हैं?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी सुनाई देती है कि चुनावी मंचों पर किए गए कुछ वादे व्यवहारिक और कानूनी चुनौतियों से टकरा जाते हैं। यदि तालाब निजी स्वामित्व में हैं तो क्या उनके विकास की जिम्मेदारी मालिक की नहीं बनती? क्या नगर परिषद केवल राजनीतिक घोषणा करके अपने दायित्व की पूर्ति मान सकती है? या फिर सार्वजनिक हित के नाम पर कोई ठोस और पारदर्शी कार्ययोजना सामने आनी चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि तालाबों का नियमित खोलीकरण केवल सौंदर्यीकरण का विषय नहीं, बल्कि जल संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे भूजल स्तर में सुधार होता है, वर्षाजल संचयन बढ़ता है और भविष्य के जलसंकट को कम करने में मदद मिलती है। लेकिन यदि योजनाएं केवल कागजों और भाषणों तक सीमित रह जाएं, तो उनका लाभ नागरिकों तक नहीं पहुंच पाता।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि शहर में टाउन प्लानिंग, स्वच्छता, जलापूर्ति, स्वास्थ्य और बुनियादी विकास से जुड़े कई मुद्दे आज भी समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे में घोषणापत्र के वादों की समीक्षा करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। जनता यह जानना चाहती है कि जो वादे चुनाव के समय किए गए थे, वे कितने पूरे हुए और कितने अभी भी फाइलों में बंद हैं।
यदि तालाबों का खोलीकरण और सौंदर्यीकरण वास्तव में शहर के हित में आवश्यक है, तो नगर परिषद को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि कार्य किस चरण में है, निधि का स्रोत क्या है, कानूनी प्रक्रिया क्या अपनाई गई है और कब तक नागरिकों को उसका लाभ मिलेगा। वहीं यदि निजी स्वार्थ, स्वामित्व विवाद या प्रशासनिक उदासीनता विकास कार्यों में बाधा बन रही है, तो उसकी जानकारी भी सार्वजनिक होना चाहिए।
फिलहाल घोषणापत्र का 17वां मुद्दा राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है। पहले वर्ष का लेखा-जोखा अभी अधूरा है, लेकिन जनता की निगाहें इस पर टिकी हैं कि यह वादा विकास की हकीकत बनेगा या केवल चुनावी दस्तावेज का एक आकर्षक वाक्य साबित होगा। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि जनता का भरोसा मजबूत हुआ या फिर राजनीतिक दावों और जमीनी सच्चाई के बीच की दूरी और बढ़ गई।




