Thursday, May 28, 2026

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“जाहिरनामा” का 11वां वादा सवालों के घेरे में : घुग्घुस में स्थायी घर पट्टों का सपना कब होगा पूरा?

प्रणयकुमार बंडी

घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनाव के दौरान राजनीतिक दल जनता के सामने विकास, सुविधाओं और मूलभूत अधिकारों से जुड़े बड़े-बड़े वादे करते हैं। इन्हीं वादों को “जाहिरनामा” का नाम दिया जाता है। वर्ष 2025 के नगर परिषद चुनाव में भी सत्ता पक्ष द्वारा 37 आकर्षक मुद्दों वाला जाहिरनामा जारी किया गया था। इसमें 11वें नंबर पर एक महत्वपूर्ण वादा किया गया था कि अमराई, तिलकनगर, शिवनगर, शांतिनगर सहित अन्य वार्डों के नागरिकों को स्थायी घर पट्टे दिलाए जाएंगे।

यही मुद्दा आज शहर की राजनीति और नगर परिषद प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल बनता दिखाई दे रहा है। नगर परिषद क्षेत्र के 11 प्रभागों में रहने वाले हजारों परिवार वर्षों से राजस्व, वन विभाग, लीज तथा सरकारी जमीनों पर अपने आशियाने बनाकर पीढ़ियां गुजार रहे हैं। ऐसे में स्थायी घर पट्टे मिलने की उम्मीद ने लोगों में एक नई आस जगाई थी।

बीजेपी सरकार की पहल, सर्वेक्षण प्रक्रिया और घर पट्टे को लेकर शुरू हुई हलचल से नागरिकों में कुछ समय के लिए विश्वास भी पैदा हुआ। नागपुर से आए सर्वेयरों ने घुग्घुस क्षेत्र का सर्वे किया। भू-अभिलेख विभाग की नोटिसें नगर परिषद कार्यालय के नोटिस बोर्ड पर लगाई गईं। कुछ लोगों के ऑनलाइन फॉर्म भी भरे गए। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पूरी प्रक्रिया वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंच पाई?

शहर में चर्चा है कि अनेक गरीब और जरूरतमंद परिवार सर्वेक्षण से ही बाहर रह गए। कुछ स्थानों पर अधिकारी पहुंचे ही नहीं, जबकि WCL जमीन पर बसे लोगों का सर्वे भी अधूरा बताया जा रहा है। ऐसे में जिन लोगों ने वर्षों से स्थायी घर पट्टे का सपना देखा, उनका सपना कहीं फिर केवल राजनीतिक घोषणा बनकर तो नहीं रह जाएगा? यह सवाल अब खुलकर उठने लगा है।

नगर परिषद प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आम नागरिकों का आरोप है कि नगर परिषद कार्यालय में मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, सभापति, इंजीनियर और सुपरवाइजर की भूमिका केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित होकर रह गई है। जनता का कहना है कि अधिकारी वातानुकूलित केबिनों और कूलर के नीचे बैठकर फाइलें पलटने में व्यस्त दिखाई देते हैं, जबकि जमीनी समस्याओं की ओर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई देती।

स्थिति यह है कि किसी भी समस्या को लेकर नागरिक संबंधित विभाग या जनप्रतिनिधि के पास जाते हैं तो उन्हें “CO से बात करो” कहकर टाल दिया जाता है। जिस प्रभाग की जिम्मेदारी जिस अधिकारी या जनप्रतिनिधि पर होती है, वहीं जिम्मेदारी आगे बढ़ाकर अपना पल्ला झाड़ते नजर आते हैं। इससे आम नागरिक असमंजस और दुविधा में फंस जाता है।

नगर परिषद की कार्यप्रणाली को लेकर यह भी चर्चा है कि कई योजनाएं परफेक्ट प्लानिंग और पर्याप्त फंड के अभाव में “ऑक्सीजन” पर चल रही हैं। जमीनी स्तर पर विकास और प्रशासनिक सक्रियता की जो तस्वीर दिखाई देनी चाहिए, वह फिलहाल दूर-दूर तक नजर नहीं आती। जनता का कहना है कि केवल जाहिरनामा प्रकाशित कर देना ही विकास नहीं होता, बल्कि उसके परिणाम भी जमीन पर दिखाई देने चाहिए।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अमराई, तिलकनगर, शिवनगर, शांतिनगर सहित अन्य वार्डों के नागरिकों को स्थायी घर पट्टे दिलाने के वादे पर सत्ता पक्ष कितना खरा उतरता है? पहले वर्ष में इस मुद्दे पर कितनी वास्तविक प्रगति हुई है, इसका जवाब आने वाले समय में सामने आएगा।

फिलहाल जनता सब देख रही है — वादे भी, सर्वे भी, नोटिस भी और जमीनी हकीकत भी। आने वाले वर्षों में यही तय होगा कि राजनीति भारी पड़ती है या जनता की उम्मीदें। सत्ता पक्ष के पांच साल का वास्तविक मूल्यांकन अब कागजों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले कामों से होगा।

पार्ट.11…

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