Saturday, April 18, 2026

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घुग्घुस नगरपरिषद में समिति गठन बना सियासी टकराव का केंद्र

धनोजे कुणबी समाज में उबाल, कांग्रेस नेतृत्व के सामने भरोसे की बड़ी चुनौती

(प्रणयकुमार बंडी)

घुग्घुस, चंद्रपुर : शहर की घुग्घुस नगरपरिषद में दिनांक 21 जनवरी 2026 को विषय समितियों का गठन किया गया। इस अवसर पर नगरपरिषद सभागृह में नवनिर्वाचित सदस्यों की विशेष सभा उप-विभागीय अधिकारी तथा पीठासीन अधिकारी की अध्यक्षता में संपन्न हुई। तय निर्णय के अनुसार प्रत्येक विषय समिति में पांच सदस्य होंगे, जिनमें तीन कांग्रेस और दो भाजपा के सदस्य शामिल रहेंगे।

इस प्रक्रिया में पानी पुरवठा समिति के सभापति पद पर नगरपरिषद उपाध्यक्ष राजुरेड्डी का सर्वसम्मति से चयन किया गया। सार्वजनिक बांधकाम व क्रीडा समिति के सभापति पद पर रोशन पचारे, नियोजन विकास व सांस्कृतिक कार्य समिति के सभापति पद पर राष्ट्रवादी कांग्रेस (अजित पवार गुट) के रविश सिंह, स्वच्छता वैद्यक व सार्वजनिक आरोग्य समिति के सभापति पद पर नुरूल सिद्दीकी, जबकि महिला व बालकल्याण समिति के सभापति पद पर माला मेश्राम तथा उप-सभापति पद पर श्रुतिका कलवलं की नियुक्ति की गई।
चयन के बाद कार्यकर्ताओं द्वारा पुष्पहार पहनाकर तथा आतिशबाजी कर उत्सव मनाया गया।

सोशल मीडिया पर उभरा तीखा विरोध

हालांकि, इसी समिति गठन के साथ ही सोशल मीडिया पर एक तीखा और भावनात्मक निवेदन तेजी से वायरल हो गया है, जिसने पूरे शहर की राजनीति को झकझोर कर रख दिया है। यह निवेदन धनोजे कुणबी समाज पर हुए कथित राजनीतिक अन्याय को लेकर है। निवेदन के अनुसार, 21 जनवरी को हुई सभापति चयन प्रक्रिया से धनोजे कुणबी समाज में गहरा आक्रोश, नाराजगी और असंतोष फैल गया है।

वायरल बयान में कहा गया है कि घुग्घुस शहर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में धनोजे कुणबी समाज संख्यात्मक रूप से बहुसंख्य है और कांग्रेस की हर जीत में उसका निर्णायक योगदान रहा है। चुनावों में समाज ने निष्ठा से कांग्रेस का साथ दिया, कार्यकर्ताओं ने दिन-रात मेहनत की, लेकिन आज उसी समाज को सत्ता के निर्णायक पदों से दूर रखा गया।

महिला प्रतिनिधित्व पर गंभीर सवाल

सबसे गंभीर आरोप यह है कि धनोजे कुणबी समाज की दो महिला नगरसेविकाओं में से एक को भी किसी समिति का सभापति पद नहीं दिया गया, जबकि अन्य समाजों को प्राथमिकता दी गई। इसे समाज ने न केवल अन्यायपूर्ण बल्कि अपमानजनक करार दिया है। दावा किया गया है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने पूर्व में सकारात्मक आश्वासन दिया था, लेकिन स्थानीय नेतृत्व ने उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

‘स्वीकृत नगरसेवक’ प्रकरण: भरोसे का टूटना

विवाद यहीं नहीं रुका। निवेदन में स्वीकृत नगरसेवक के मुद्दे को “शब्दभंग और राजनीतिक विश्वासघात” बताया गया है। चुनाव के दौरान कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता द्वारा धनोजे कुणबी समाज के व्यक्ति को सर्वप्रथम स्वीकृत नगरसेवक बनाने का वचन दिया गया था। इसी भरोसे पर संबंधित व्यक्ति ने आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ा। लेकिन सत्ता मिलने के बाद वह वचन निभाया नहीं गया और अन्य समाज के व्यक्ति को स्वीकृत नगरसेवक बना दिया गया।

समाज का सीधा सवाल है—यदि पहले से ही भूमिका बदलनी थी, तो समाज को भरोसा क्यों दिलाया गया? और यदि नहीं, तो अचानक यह फैसला कैसे लिया गया?

स्थानीय नेतृत्व पर दोहरे चरित्र का आरोप

वायरल निवेदन में घुग्घुस के कांग्रेस के दो प्रमुख स्थानीय नेताओं पर भी तीखा हमला किया गया है। आरोप है कि ये नेता सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे के विरोधी बनते हैं, लेकिन निजी स्वार्थ के लिए हमेशा साथ आ जाते हैं। कार्यकर्ताओं और समाज का उपयोग कर निर्णय अपने हित में लेने का आरोप लगाते हुए इसे “ढोंगी राजनीति” करार दिया गया है।

कांग्रेस के लिए चेतावनी या अवसर?

इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस नेतृत्व के सामने एक मूलभूत प्रश्न खड़ा कर दिया है—
क्या आने वाली जिला परिषद, लोकसभा और विधानसभा चुनावों में धनोजे कुणबी समाज के मतों की जरूरत नहीं है? क्या समाज को केवल चुनाव के समय याद किया जाएगा और सत्ता में हिस्सेदारी से दूर रखा जाएगा?

समाधान की राह क्या?

यह विवाद केवल विरोध नहीं, बल्कि कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का अवसर भी हो सकता है। यदि पार्टी नेतृत्व समय रहते हस्तक्षेप करे, सभापति पदों और स्वीकृत नगरसेवक प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराए, तथा धनोजे कुणबी समाज को उचित सम्मान और प्रतिनिधित्व दे, तो बढ़ती नाराजगी को रोका जा सकता है।

स्पष्ट संदेश

सुधाकर गणपत बांदुरकर (अध्यक्ष, जगन्नाथ बाबा बहुउद्देशीय धनोजे कुणबी समाज संस्था घुग्घुस. तथा समस्त धनोजे कुणबी समाज, घुग्घुस शहर व ग्रामीण परिसर, जिल्हा चंद्रपूर, महाराष्ट्र.) ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है—“शब्द दिया है तो निभाना होगा, नहीं तो समाज शब्दभंग को कभी नहीं भूलता।”

अब देखना यह है कि कांग्रेस का वरिष्ठ नेतृत्व इस चेतावनी को गंभीरता से लेकर समाधान की दिशा में कदम उठाता है, या फिर यह असंतोष भविष्य की राजनीति में कांग्रेस के लिए भारी साबित होता है।

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