(प्रणयकुमार बंडी)
चंद्रपुर जिले की घुग्घुस नगर परिषद चुनाव–2025 के मतगणना परिणाम 21 दिसंबर 2025 को घोषित हुए। प्रभाग क्रमांक 1 से 11 तक (अनुसूचित जाति–महिला आरक्षण) के मतदान आंकड़े लोकतांत्रिक भागीदारी का स्पष्ट संकेत देते हैं। कुल 17,729 वैध मतों का दर्ज होना यह दर्शाता है कि मतदाताओं ने न केवल अपने अधिकार का प्रयोग किया, बल्कि स्थानीय शासन से अपेक्षाओं को भी मजबूती से व्यक्त किया।
लेकिन इन सकारात्मक आंकड़ों के उलट, चुनाव परिणामों के बाद एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है—डायरेक्ट चुने गए नगराध्यक्ष ने अब तक पदग्रहण क्यों नहीं किया?
कानून बनाम ज़मीनी हकीकत
सामान्यतः चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद, अधिसूचना जारी होने और औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने पर नगराध्यक्ष कुछ ही दिनों में पदग्रहण कर सकता है। यह प्रक्रिया लंबी नहीं होती, क्योंकि प्रत्यक्ष चुनाव का उद्देश्य ही यही है कि जनता द्वारा चुना गया नेतृत्व तुरंत प्रशासनिक जिम्मेदारी संभाले। इसके बावजूद, घुग्घुस में अब तक अध्यक्ष पद ग्रहण न होना कई शंकाओं को जन्म दे रहा है।
चर्चाओं का बाजार गर्म
शहर में इस देरी को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कोई इसे आगामी महानगरपालिका चुनाव से जोड़कर देख रहा है, तो कोई इसे राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मान रहा है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या बड़े चुनावों का हवाला देकर स्थानीय निकाय को जानबूझकर हाशिये पर डाला जा रहा है?
कुछ लोग इसे “विकास के समीकरण” का हिस्सा बता रहे हैं, जबकि आम नागरिकों की नजर में यह नेताओं और अधिकारियों की खुली अनदेखी से कम नहीं है।
प्रशासनिक शून्यता का असर
नगराध्यक्ष के पदग्रहण में देरी का सीधा असर नगर परिषद के कामकाज पर पड़ता है। विकास योजनाओं की दिशा, प्रशासनिक निर्णय और जवाबदेही—सब कुछ असमंजस में चला जाता है। जब जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया है, तब नेतृत्व का अभाव लोकतंत्र की आत्मा पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
लोकतंत्र की कसौटी
17,729 मत केवल आंकड़े नहीं हैं, वे भरोसे का प्रतीक हैं। यह भरोसा तभी कायम रह सकता है, जब चुना हुआ प्रतिनिधि समय पर जिम्मेदारी संभाले। अन्यथा यह संदेश जाता है कि चुनाव तो हो जाते हैं, लेकिन जनादेश का सम्मान टलता रहता है।
घुग्घुस नगर परिषद का यह मामला केवल एक पदग्रहण की देरी नहीं है, बल्कि यह स्थानीय स्वशासन, प्रशासनिक पारदर्शिता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की परीक्षा है। जनता अब जवाब चाहती है—अध्यक्ष कब पदग्रहण करेंगे, और देरी की जिम्मेदारी कौन लेगा?
लोकतंत्र में सवाल उठना स्वाभाविक है, लेकिन उनका जवाब मिलना अनिवार्य। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह चुप्पी खुद एक बड़ा राजनीतिक बयान बन जाएगी।




