बाबा खड़क सिंह (1867–1963): सिखों की आवाज़ और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी
बाबा खड़क सिंह का जन्म 6 जून 1867 को पंजाब के सियालकोट ज़िले (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। वे न सिर्फ़ एक धार्मिक नेता थे, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख चेहरों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने गुरुद्वारा सुधार आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई और सिख समुदाय को ब्रिटिश शासन की गुलामी से मुक्त कराने के लिए जीवन समर्पित कर दिया।
बाबा खड़क सिंह शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के पहले निर्वाचित अध्यक्ष बने। वे अंग्रेज़ों द्वारा गुरुद्वारों पर किए गए हस्तक्षेप का ज़ोरदार विरोध करते थे। 1921 में गुरुद्वारा आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया, लेकिन उनकी दृढ़ता ने लाखों लोगों को प्रेरित किया।
उन्होंने खादी पहनना शुरू किया, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया और देशभर में स्वदेशी आंदोलन को समर्थन दिया। उनकी विचारधारा गांधीजी से मिलती-जुलती थी, लेकिन वह सिख स्वाभिमान को लेकर एक अलग ही चेतना जगाने वाले नेता थे।
बाबा खड़क सिंह का जीवन हमें बताता है कि धर्म और देशभक्ति का मेल राष्ट्र निर्माण में कितनी बड़ी भूमिका निभा सकता है।
उपेन्द्रनाथ बंधोपाध्याय (1880–1937): क्रांति की कलम और आज़ादी की आवाज़
उपेन्द्रनाथ बंधोपाध्याय का जन्म बंगाल में हुआ था और वे प्रमुख क्रांतिकारी, लेखक और पत्रकार थे। वे ‘युगांतर’ और ‘बंदे मातरम्’ जैसे राष्ट्रवादी पत्रों से जुड़े रहे, जो उस समय ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाले प्रमुख माध्यम थे।
वे भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के उग्रपंथी धड़े से जुड़े थे और विदेशी शासन के खिलाफ़ हिंसात्मक प्रतिरोध का समर्थन करते थे। बंधोपाध्याय पर कई बार देशद्रोह के आरोप लगे और वे जेल भी गए, लेकिन उनका हौसला कभी नहीं टूटा।
उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में विचारधारा की एक नई दिशा दी, जहां कलम और विचार हथियारों की तरह तेज़ हो सकते हैं। उनके लेख अंग्रेज़ी हुकूमत के लिए इतनी चुनौतीपूर्ण होते थे कि कई बार अख़बारों पर पाबंदियाँ लगानी पड़ीं।
उपेन्द्रनाथ बंधोपाध्याय उन गुमनाम नायकों में से एक हैं, जिन्होंने आज़ादी के आंदोलन को बौद्धिक और वैचारिक स्तर पर मज़बूती दी।
नमन उन महान आत्माओं को…
6 जून का दिन इतिहास में सिर्फ़ तारीख़ नहीं, बल्कि दो ऐसी प्रेरणास्पद हस्तियों की याद है, जिन्होंने अपने-अपने तरीक़ों से देश को आज़ाद कराने में अहम भूमिका निभाई। एक ने धार्मिक अस्मिता के लिए आवाज़ उठाई, तो दूसरे ने क्रांति की लौ को शब्दों से जलाया।
आज का दिन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है — क्या हम उनके सपनों का भारत बना पाए हैं?




