प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनाव के दौरान राजनीतिक दल जनता के सामने विकास, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं के बड़े-बड़े वादों के साथ आकर्षक “जाहिरनामा” पेश करते हैं। वर्ष 2025 के चुनावी जाहिरनामे में भी सत्ता पक्ष द्वारा 37 मुद्दों को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया था। इनमें 7वां मुद्दा खास तौर पर युवाओं और बेरोजगारों से जुड़ा था —
“शहरातील उद्योगात स्थानिक युवकांना रोजगाराकडे विशेष लक्ष देण्यात येईल.”
लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि यह वादा जमीनी स्तर पर कितना उतरा?
घुग्घुस नगर परिषद क्षेत्र के 11 प्रभागों में बड़ी संख्या में शिक्षित बेरोजगार युवक आज भी रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। आईटीआई, डिप्लोमा, डिग्री, मास्टर, पीजी और तकनीकी शिक्षा प्राप्त अनेक युवक जैसे-तैसे अपना जीवन चला रहे हैं। दूसरी ओर शहर और आसपास के क्षेत्र में आयरन एंड पावर तथा सीमेंट कंपनियों का बड़ा विस्तार है। इन कंपनियों के अंतर्गत जमीन, पार्किंग, लेबर कॉलोनी, कैंटीन, सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यालय जैसी अनेक सुविधाएं नगर परिषद क्षेत्र में मौजूद हैं, फिर भी स्थानीय युवाओं को अपेक्षित रोजगार नहीं मिल पा रहा है।
स्थानीय लोगों में चर्चा है कि कंपनियों में नौकरी पाने के लिए अब योग्यता से अधिक “सिफारिश” जरूरी हो गई है। राजनीतिक दबाव या नेताओं की अनुशंसा के बिना रोजगार मिलना मुश्किल माना जा रहा है। कई युवाओं का आरोप है कि उन्हें उनकी शिक्षा और तकनीकी योग्यता के अनुसार अवसर देने के बजाय सामान्य मजदूर बनाकर काम पर लगाया जाता है। कम वेतन, अस्थिर रोजगार और असुरक्षित भविष्य के कारण कई लोग नौकरी छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
महंगाई के इस दौर में मजदूरों और कर्मचारियों को मूल वेतन से भी कम भुगतान मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं। ऐसे में परिवार का पालन-पोषण करना भी कठिन होता जा रहा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि वास्तव में रोजगार नीति पारदर्शी होती, तो शहर के शिक्षित युवाओं की स्थिति इतनी चिंताजनक नहीं होती।
अब सवाल केवल रोजगार का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी है। आम जनता में यह चर्चा तेज है कि संबंधित विभाग और अधिकारी आखिर जमीनी हकीकत पर कितना ध्यान दे रहे हैं?
कलेक्टर, लेबर ऑफिसर, तहसीलदार, MIDC प्रशासन, नगर परिषद के मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, सभापति, इंजीनियर और सुपरवाइजर की भूमिका केवल एसी केबिन और फाइलों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। कागजों में “सब कुछ ठीक” दिखाने से वास्तविक स्थिति नहीं बदलती। जरूरत इस बात की है कि कंपनियों में कार्यरत स्थानीय और बाहरी कर्मचारियों की वास्तविक संख्या, उनका पुलिस वेरिफिकेशन, सुरक्षा व्यवस्था, रहने की सुविधाएं, स्वास्थ्य सेवाएं और श्रमिक अधिकारों की निष्पक्ष जांच हो।
स्थानीय नागरिक यह भी सवाल उठा रहे हैं कि कंपनियों में कितने प्रतिशत स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला? कितने बाहरी कर्मचारी बिना उचित सत्यापन के कार्यरत हैं? मजदूरों और कर्मचारियों के लिए सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है या नहीं? कंपनियों द्वारा स्थानीय जनता के लिए कितने मेडिकल कैंप और स्वास्थ्य योजनाएं चलाई गईं? सार्वजनिक रास्तों और जमीनों पर अवैध कब्जों की जांच हुई या नहीं? नगर परिषद और संबंधित विभागों ने इन मुद्दों पर कितनी कार्रवाई की?
जनता के बीच अब यह भावना मजबूत होती दिखाई दे रही है कि चुनावी वादे और वास्तविकता में बड़ा अंतर है। रोजगार का मुद्दा आज भी शहर की सबसे बड़ी समस्या बना हुआ है। ऐसे में सत्ता पक्ष का 7वां वादा सिर्फ राजनीतिक घोषणा था या वास्तव में विकास का रोडमैप — इसका जवाब आने वाले वर्षों में जनता खुद तय करेगी।
फिलहाल घुग्घुस में चर्चा यही है कि जनता अब भाषणों और घोषणाओं से आगे बढ़कर जमीन पर काम देखना चाहती है। आने वाले समय में यह भी स्पष्ट होगा कि सत्ता पक्ष रोजगार की परीक्षा में कितना सफल रहा और कितना असफल।
अब देखना होगा कि आने वाले पांच वर्षों में जनता का विश्वास मजबूत होता है या फिर “जाहिरनामा” केवल चुनावी जुमला बनकर रह जाता है।




