गंभीर आरोपों पर अफसरों की रहस्यमयी चुप्पी
(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घुस नगर परिषद चुनाव 2025 में चुनकर आए 22 नगर सेवकों में से कुछ के खिलाफ अतिक्रमण, कॉस्ट सर्टिफिकेट और वैलिडिटी प्रमाणपत्र को लेकर गंभीर और दस्तावेज़युक्त शिकायतें दर्ज कराई गई हैं। इन शिकायतों को लेकर निवडणूक अधिकारी, नगर परिषद के मुख्याधिकारी, तहसीलदार चंद्रपुर, जिला कलेक्टर, समाज कल्याण विभाग, महसूल मंत्री और मुख्यमंत्री कार्यालय तक अर्ज व निवेदन सौंपे गए। लेकिन कई दिन बीत जाने के बाद भी न जांच, न नोटिस, न सुनवाई—सिर्फ चुप्पी। यह चुप्पी अब सामान्य नहीं, बल्कि संदेह के घेरे में आती प्रशासनिक निष्क्रियता बन चुकी है।
जिम्मेदारी किसकी? फाइलें किसके टेबल पर रुकी हैं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि शिकायतें गलत हैं, तो खारिज क्यों नहीं की गईं? यदि शिकायतें सही हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या निवडणूक अधिकारी निर्णय लेने से बच रहे हैं? नगर परिषद के मुख्याधिकारी दबाव में हैं? तहसील और जिला प्रशासन राजनीतिक संकेतों का इंतजार कर रहा है? जनता पूछ रही है—फाइलें आखिर किसके टेबल पर सड़ रही हैं?
अतिक्रमण और वैलिडिटी: कागज बोलते हैं, अधिकारी चुप
सूत्रों की मानें तो शिकायतों में अतिक्रमण से जुड़े तथ्य, जाति प्रमाणपत्र से संबंधित कॉस्ट सर्टिफिकेट, वैलिडिटी में कथित अनियमितताओं का स्पष्ट उल्लेख है। बावजूद इसके, जांच समिति तक गठित नहीं की गई। क्या यही “सुशासन” है?
राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक डर?
शहर में खुली चर्चा है कि “इस प्रकरण में कार्रवाई नहीं होनी चाहिए”
इसके लिए स्थानीय नेताओं से लेकर जिले और राज्य स्तर के प्रभावशाली चेहरों का दबाव अधिकारियों पर है। अगर ऐसा है, तो यह केवल घुग्घुस की नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की साख पर सवाल है।
विपक्ष की चुप्पी भी कटघरे में
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सत्ता से सवाल पूछने की होती है। लेकिन इस पूरे मामले में विपक्षी नगर सेवकों की चुप्पी भी उतनी ही चौंकाने वाली है। क्या सभी एक-दूसरे की फाइलों से डरते हैं? या फिर यह “तू-तू मैं-मैं” के बाद का मौन समझौता है? जनता पूछ रही है—विपक्ष जनता के साथ है या सत्ता के साथ?
कुछ वोटों से हारे उम्मीदवार कोर्ट क्यों नहीं गए?
चुनाव में कुछ ही मतों से पीछे रहे उम्मीदवार इस मुद्दे पर आक्रामक बयान तो दे रहे हैं, लेकिन अब तक न्यायालय का दरवाजा क्यों नहीं खटखटाया? क्या उन्हें कार्रवाई से पहले “ग्रीन सिग्नल” का इंतजार है? या फिर वे भी इस पूरे खेल का हिस्सा बन चुके हैं?
डिस्क्वालिफिकेशन हुआ तो फायदा किसे?
सबसे अहम सवाल अब यह है कि अगर संबंधित नगर सेवक डिस्क्वालिफाई होते हैं, तो क्या शिकायतकर्ता उम्मीदवार को प्राथमिकता मिलेगी? या फिर किसी और को राजनीतिक लाभ पहुंचाया जाएगा? यही कारण है कि यह मामला अब कानूनी से ज्यादा राजनीतिक साज़िश के रूप में देखा जा रहा है।
घुग्घुस में यह मुद्दा अब केवल नगर परिषद तक सीमित नहीं रहा। यह मामला बन चुका है—प्रशासनिक साहस की परीक्षा, राजनीतिक ईमानदारी की कसौटी और लोकतंत्र की सच्चाई का आईना. अब सवाल यह नहीं कि कार्रवाई होगी या नहीं, सवाल यह है—कब और किसके खिलाफ होगी? जनता देख रही है, शहर सवाल कर रहा है और इतिहास गवाही लिख रहा है।




