प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा जनता से किए गए वादे अक्सर आकर्षक शब्दों और बड़े-बड़े दावों से भरे होते हैं। नगर परिषद चुनाव 2025 के दौरान भी सत्ता पक्ष द्वारा जारी किए गए “जाहिरनामा” में 37 महत्वपूर्ण मुद्दों को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया था। इन्हीं में से एक मुद्दा क्रमांक 12 था — “बेरोजगार महिलांसाठी स्वयंरोजगार उपलब्ध केल्या जाईल”। अब चुनाव के बाद जनता इस वादे की जमीनी हकीकत तलाशती नजर आ रही है।
नगर परिषद क्षेत्र के 11 प्रभागों में रहने वाले अनेक परिवारों की महिलाओं को उम्मीद थी कि उन्हें रोजगार, स्वरोजगार, प्रशिक्षण अथवा किसी स्थानीय उद्योग से जोड़ने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे। खास बात यह है कि इनमें कई महिलाएं 10वीं, 12वीं, ग्रेजुएशन, मास्टर डिग्री और पीजी जैसी उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुकी हैं। बावजूद इसके रोजगार के अवसर आज भी सीमित दिखाई दे रहे हैं।
कई परिवार आज भी रेवेन्यू, फॉरेस्ट, लीज अथवा सरकारी जमीन पर बने छोटे मकानों में जीवनयापन कर रहे हैं और छोटे-मोटे काम करके किसी तरह अपना घर चला रहे हैं। दूसरी ओर, स्थानीय स्तर पर रोजगार की उम्मीद में कई युवाओं और महिलाओं ने पास की एक विस्ताराधीन कंपनी में अपना रिज्यूम भी जमा किया, लेकिन चर्चाओं के अनुसार जिन लोगों के पास राजनीतिक प्रभाव था उन्हें अस्थायी रोजगार मिल गया, जबकि योग्य और जरूरतमंद लोग आज भी काम की तलाश में भटक रहे हैं।
शहर में अब यह चर्चा तेज होती जा रही है कि आखिर चुनावी आश्वासनों की “पिटारा” कब खुलेगी? जनता के मन में सवाल उठ रहा है कि रोजगार देने का सपना कहीं केवल चुनावी नारा बनकर तो नहीं रह जाएगा?
घुग्घुस नगर परिषद क्षेत्र में जनता अब सत्ता पक्ष की कार्यप्रणाली को सीधे तौर पर वादों की कसौटी पर तौल रही है। लोगों का कहना है कि चुनाव के समय बड़े दावे किए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर उनकी झलक दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही।
नगर परिषद कार्यालय की कार्यप्रणाली पर भी नागरिकों ने सवाल खड़े किए हैं। आम लोगों का आरोप है कि मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, सभापति, इंजीनियर और सुपरवाइजर जैसे जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी केवल एसी केबिन और कूलर के नीचे बैठकर फाइलों और नियमों तक सीमित नजर आते हैं। शहर के विकास, टाउन प्लानिंग और जनसमस्याओं के समाधान की दिशा में ठोस कार्रवाई जनता को दिखाई नहीं दे रही।
सबसे बड़ी समस्या जवाबदेही की बताई जा रही है। नागरिकों का कहना है कि किसी भी समस्या को लेकर संबंधित विभाग या कर्मचारी से बात करने पर एक ही जवाब मिलता है — “CO से बात करो।” ऐसे में जिस प्रभाग की जिम्मेदारी जिस अधिकारी या प्रतिनिधि पर है, वह भी अपनी जवाबदेही मुख्याधिकारी पर डालकर पल्ला झाड़ते दिखाई देते हैं। इससे आम नागरिक दुविधा और निराशा में पड़ जाता है।
जनता के बीच यह भी चर्चा है कि क्या नगर परिषद प्रशासन परफेक्ट प्लानिंग और फंड की कमी के कारण “ऑक्सीजन” पर चल रहा है? क्योंकि घोषणाएं और दावे तो लगातार किए जा रहे हैं, लेकिन जमीन पर उनका प्रभाव नाम मात्र दिखाई देता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि “बेरोजगार महिलाओं को स्वयंरोजगार” देने वाला जाहिरनामा का 12वां मुद्दा पहले वर्ष में कितना सफल रहा? इसका वास्तविक जवाब शायद आने वाले दूसरे वर्ष में जनता के सामने स्पष्ट हो सकेगा।
फिलहाल घुग्घुस की जनता यह देख रही है कि चुनावी राजनीति सही साबित होती है या जनता की अपेक्षाएं। क्योंकि अगले पांच वर्षों में सत्ता पक्ष की असली पहचान भाषणों से नहीं, बल्कि जमीन पर किए गए कामों से तय होगी।




