प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनाव आते ही राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा जनता के सामने विकास के बड़े-बड़े दावे और आकर्षक “जाहिरनामा” पेश किए जाते हैं। वर्ष 2025 के चुनावी जाहिरनामे में भी 37 आकर्षक मुद्दों का उल्लेख किया गया था। उन्हीं में से एक प्रमुख मुद्दा था — “शहरात भव्य क्रीडांगणाची निर्मिती केल्या जाईल” अर्थात शहर में भव्य क्रीड़ांगण का निर्माण किया जाएगा।
घोषणा सुनने में प्रभावशाली जरूर लगती है, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी कई सवाल खड़े कर रही है। नगर परिषद क्षेत्र के 11 प्रभागों में करोड़ों रुपये खर्च कर चिल्ड्रन पार्क, गार्डन, जिम, हॉल और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं बनाई गईं, लेकिन इनमें से कई स्थान आज देखभाल के अभाव में बदहाल और जीर्ण अवस्था में पड़े हैं। व्यायाम के उपकरण टूट रहे हैं, गार्डनों की हालत खराब है और सार्वजनिक संपत्ति धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब पहले से बने सार्वजनिक स्थलों की सुरक्षा और रखरखाव ही सही ढंग से नहीं हो पा रहा, तब नए “भव्य क्रीड़ांगण” के वादे कितने व्यावहारिक हैं? लोगों का मानना है कि यदि नगर परिषद पहले से मौजूद सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा और देखभाल पर ध्यान दे, तो करोड़ों रुपये की सामग्री बच सकती है और बेरोजगार युवाओं को रोजगार भी मिल सकता है।
देखभाल के नाम पर वसूली का आरोप
कुछ ओपन प्लेस और सार्वजनिक स्थलों की देखरेख निजी संस्थाओं को सौंपे जाने की चर्चा भी शहर में जोर पकड़ रही है। आरोप है कि कार्यक्रमों के लिए आम नागरिकों से 20 से 25 हजार रुपये तक शुल्क लिया जाता है, लेकिन कई मामलों में रसीद तक नहीं दी जाती। ऐसे में सवाल उठता है कि जब इन स्थलों के विकास, सौंदर्यीकरण और रखरखाव के लिए सरकारी निधि खर्च हो रही है, तो फिर आम जनता से भारी शुल्क क्यों लिया जा रहा है?
यदि शुल्क निर्धारित है तो क्या उसकी अधिकृत सूची सार्वजनिक की गई है? नगर परिषद प्रशासन ने इसके लिए कोई पारदर्शी नियम जारी किया है या नहीं? यह जानकारी आम लोगों तक क्यों नहीं पहुंचाई जाती? ऐसे कई सवाल अब नागरिक खुलकर पूछने लगे हैं।
सरकारी हॉल छोड़ निजी लॉन पर खर्च क्यों?
शहर में सरकारी खर्च से निर्मित एसी युक्त हॉल उपलब्ध होने के बावजूद नगर परिषद के छोटे-बड़े कार्यक्रम निजी लॉन और निजी स्थलों पर आयोजित किए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आखिर सरकारी सुविधा होने के बाद भी निजी स्थलों पर शुल्क देकर सरकारी धन क्यों खर्च किया जा रहा है? क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या फिर किसी विशेष हित को बढ़ावा देने की कोशिश?
“कागजों में सब ठीक” वाली व्यवस्था पर सवाल
नागरिकों का आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारी केवल एसी केबिन और कूलर के नीचे बैठकर कागजों में “सब ठीक” लिखने तक सीमित हो गए हैं। कलेक्टर, तहसीलदार, मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, सभापति, इंजीनियर और सुपरवाइजर जैसे जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को अब जमीनी हकीकत भी देखनी होगी।
शहर में जनता के साथ न्याय हो रहा है या अन्याय, सरकारी संपत्तियों का उपयोग पारदर्शी है या नहीं, सार्वजनिक सुविधाओं का लाभ आम नागरिकों तक पहुंच रहा है या नहीं — इन सवालों पर गंभीरता से ध्यान देना समय की मांग बन चुकी है।
जनता अब वादों से ज्यादा काम देखना चाहती है
भव्य क्रीड़ांगण का वादा अभी तक जमीन पर कितना उतरा है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। लेकिन जनता अब केवल घोषणाओं और जुमलों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। पिछले अनुभवों के कारण लोगों का भरोसा खोखले वादों से उठता दिखाई दे रहा है।
अब यह आने वाले वर्षों में तय होगा कि “जाहिरनामा” केवल चुनावी दस्तावेज था या वास्तव में विकास का रोडमैप। जनता की नजर सत्ता पक्ष के हर वादे और हर काम पर बनी हुई है। आखिरकार अगले पांच वर्षों में जमीन पर दिखाई देने वाला काम ही तय करेगा कि जनता सही थी या राजनीति।




