प्रणयकुमार बंडी
चंद्रपुर (महाराष्ट्र): लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया की ताकत उसकी निष्पक्षता, निर्भीकता और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता में होती है। लेकिन जब कुछ राजनेता पत्रकारों को सम्मान देने के बजाय अपमानित करने लगें और यह समझने लगें कि भोजन, पार्टी या व्यक्तिगत संबंधों के बदले पत्रकार सवाल पूछने का अधिकार खो देते हैं, तब यह केवल किसी एक पत्रकार का नहीं, बल्कि पूरे पत्रकार समाज के सम्मान का प्रश्न बन जाता है।
हाल ही में एक सांसद द्वारा पत्रकारों के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग और यह कहना कि “मैं तुम्हें खाना खिलाता हूँ, फिर भी सवाल पूछते हो”, लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। पत्रकार किसी नेता की कृपा से नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए सवाल पूछते हैं। यदि सत्ता से सवाल पूछना अपराध बन जाएगा, तो लोकतंत्र का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि देशभर के पत्रकार संगठन, संपादक और मीडिया संस्थान व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर एकजुट हों। किसी भी पत्रकार का अपमान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे मीडिया जगत का अपमान माना जाना चाहिए। यदि किसी नेता या उसके कार्यकर्ता द्वारा पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है, तो उसका सामूहिक विरोध होना चाहिए।
साथ ही, मीडिया को भी आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। नेताओं के हर छोटे-बड़े कार्यक्रम, स्वागत, जन्मदिन और राजनीतिक प्रचार को अत्यधिक महत्व देने की प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए। देश में बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याएं, भ्रष्टाचार, पर्यावरण और आम जनता से जुड़े अनेक मुद्दे हैं, जिन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भी यह समझना होगा कि पत्रकार किसी दल के प्रचारक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रहरी हैं। पत्रकारों पर दबाव बनाना, धमकाना, अभद्र भाषा का प्रयोग करना या सवाल पूछने से रोकना लोकतांत्रिक संस्कृति के खिलाफ है।
यदि पत्रकार समाज एकजुट होकर अपने स्वाभिमान और पेशे की गरिमा के लिए खड़ा हो जाए, तो किसी भी नेता या कार्यकर्ता की हिम्मत नहीं होगी कि वह मीडिया को हल्के में ले। पत्रकारिता किसी नेता की मेहरबानी से नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जनता के विश्वास से चलती है। अब समय आ गया है कि मीडिया अपनी ताकत पहचाने और सत्ता के पीछे चलने के बजाय सच के साथ खड़ा हो।




