प्रणयकुमार बंडी
चंद्रपुर जिले के घुग्घुस-वणी मार्ग पर बन रहा रेलवे उड़ान पुल एक बार फिर सुर्खियों में है—लेकिन विकास के लिए नहीं, बल्कि सुस्ती और अव्यवस्था के लिए। जिस पुल से लोगों को राहत मिलने की उम्मीद थी, वही अब प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक उदासीनता का प्रतीक बनता जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, इस महीने की 20 तारीख के आसपास पुल को आम नागरिकों के लिए खोलने का अनुमान लगाया जा रहा है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक इस संबंध में कोई भी आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। न प्रशासन कुछ स्पष्ट बोल रहा है, न ही जनप्रतिनिधि जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं।
बताया जा रहा है कि पुल को शुरुआत में केवल हल्के वाहनों—जैसे पैदल यात्री, साइकिल, दुपहिया, तीन पहिया, चार पहिया और सीमित रूप से छोटे व्यावसायिक वाहनों—के लिए खोला जा सकता है। वहीं भारी वाहनों को लेकर अब भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। उन्हें पुल के नीचे से डायवर्ट किया जाएगा या किसी वैकल्पिक मार्ग पर भेजा जाएगा—इस पर कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है।
इस अनिश्चितता का सबसे बड़ा खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। घुग्घुस-वणी मार्ग पर भारी वाहनों की मनमानी पार्किंग और लगातार लगने वाले ट्रैफिक जाम से लोगों का जीना मुश्किल हो गया है। घंटों जाम में फंसे रहना अब रोज़मर्रा की बात बन चुकी है।
सबसे बड़ा सवाल पुलिस प्रशासन की भूमिका को लेकर उठ रहा है। ट्रैफिक नियंत्रण और अवैध पार्किंग पर कार्रवाई की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है, वे भी मौन साधे हुए नजर आ रहे हैं। क्या पुलिस केवल दर्शक बनी रहेगी, या फिर व्यवस्था सुधारने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगी—यह वक्त ही बताएगा।
राजनीतिक गलियारों में भी इस मुद्दे पर सन्नाटा पसरा हुआ है। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले नेता अब इस गंभीर समस्या पर चुप्पी साधे हुए हैं। जनता पूछ रही है—क्या विकास सिर्फ भाषणों तक ही सीमित रहेगा?
फिलहाल, घुग्घुस-वणी मार्ग का यह अधूरा उड़ान पुल ‘विकास’ के नाम पर एक और अधूरी कहानी बनता नजर आ रहा है, जहां जनता उम्मीदों के सहारे खड़ी है और सिस्टम अपनी ही रफ्तार में सोया हुआ है।




