(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घुस शहर नगर परिषद कार्यालय के अंतर्गत कुल 11 प्रभाग हैं, जहां 22 नगरसेवक और एक नगराध्यक्ष जनता की समस्याओं के समाधान के लिए चुने गए हैं। मार्गदर्शन और प्रशासनिक जिम्मेदारी के लिए मुख्याधिकारी, इंजीनियर तथा अन्य सरकारी स्टॉफ भी तैनात हैं। बावजूद इसके, शहर की सड़कों पर फैली अव्यवस्था यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है?
शहर की मुख्य सड़कें हों, राष्ट्रीय राजमार्ग (NH), गली-मोहल्लों की सड़कें या औद्योगिक क्षेत्र—हर जगह स्पीड ब्रेकर तो बना दिए गए, लेकिन अधिकांश आधे-अधूरे, अवैज्ञानिक और नियमों को ताक पर रखकर। कई ब्रेकरों पर न तो दिशा-सूचक पेंट है और न ही चेतावनी फलक। रात के अंधेरे में ये ब्रेकर हादसों को न्योता दे रहे हैं।
इस लापरवाही का खामियाजा रोजाना आम नागरिक भुगत रहे हैं। दोपहिया वाहन चालक गिरकर घायल हो रहे हैं, चारपहिया वाहनों को नुकसान हो रहा है और कई बार गंभीर सड़क दुर्घटनाएं भी सामने आ रही हैं। हैरानी की बात यह है कि दुर्घटना के बाद न कोई जवाबदेही तय होती है, न ही सुधार की ठोस कार्रवाई।
इन ब्रेकरों की जिम्मेदारी भी बंटी हुई है। कुछ स्पीड ब्रेकर मेटल्स एंड एनर्जी लिमिटेड, सीमेंट कंपनी और वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) जैसी निजी कंपनियों के परिसरों या मार्गों से जुड़े हैं। कुछ ब्रेकर घुग्घुस नगर परिषद द्वारा बनाए गए हैं, जबकि कई तो स्थानीय नागरिकों ने खुद ही बना लिए हैं—बिना किसी अनुमति और तकनीकी मानक के।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब CSR (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तो फिर जमीनी हकीकत इतनी बदतर क्यों है? क्या CSR सिर्फ कागजों और फोटो तक सीमित रह गया है? क्या नगर परिषद और संबंधित विभाग आंख मूंदे बैठे हैं?
घुग्घुस की जनता अब सवाल पूछ रही है—क्या नगर परिषद और प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? क्या नियमों के विरुद्ध बने ब्रेकरों पर कार्रवाई होगी या नहीं? और क्या निजी कंपनियों की CSR जिम्मेदारी सिर्फ नाम की रह जाएगी?
अगर समय रहते इन अवैज्ञानिक और जानलेवा स्पीड ब्रेकरों को हटाकर मानक के अनुसार निर्माण नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में घुग्घुस की सड़कें “सुरक्षा” नहीं, बल्कि “खतरे” की पहचान बन जाएंगी।




