(प्रणयकुमार बंडी)
चंद्रपुर | चंद्रपुर महानगरपालिका चुनाव 2025–26 को लेकर राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर है, लेकिन चुनावी तैयारियों से ज्यादा चर्चा टिकट बंटवारे को लेकर मची असंतोष की आंधी की हो रही है। विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा जारी की गई उम्मीदवारों की सूची ने न केवल कई इच्छुक प्रत्याशियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया, बल्कि वर्षों से पार्टी की सेवा कर रहे निष्ठावान कार्यकर्ताओं को भी खुलकर नाराज़ कर दिया है।
टिकट के लिए मैदान में बड़ी संख्या में इच्छुक उम्मीदवार थे, लेकिन चुनिंदा नामों को तरजीह दिए जाने से यह साफ संदेश गया कि मेहनत, निष्ठा और ज़मीनी संघर्ष से ज्यादा सिफारिश, गुटबाजी और नेतृत्व की पसंद-नापसंद हावी रही। नतीजा यह हुआ कि पार्टी के भीतर ही असंतोष फूट पड़ा।
इस नाराज़गी का असर अब सड़कों और सोशल मीडिया दोनों पर दिख रहा है। कई इच्छुक उम्मीदवारों के आक्रोश भरे वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके हैं, जिनमें वे सीधे-सीधे स्थानिक विधायक, शहर अध्यक्ष और पार्टी नेतृत्व पर पक्षपात के आरोप लगाते नजर आ रहे हैं। यह दृश्य किसी भी दल के लिए शुभ संकेत नहीं माने जा सकते।
स्थिति यहीं नहीं रुकी। कुछ नाराज़ इच्छुक उम्मीदवारों ने पार्टी अनुशासन को ठेंगा दिखाते हुए बंडखोरी (बगावत) का रास्ता अपनाया और निर्दलीय या अन्य विकल्पों के तहत अपना नामांकन दाखिल कर दिया। यह कदम न केवल पार्टी की अधिकृत रणनीति को कमजोर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि नेतृत्व अपने ही लोगों को संभालने में विफल रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पार्टी के आला पदाधिकारी समय रहते इन नाराज़ नेताओं और कार्यकर्ताओं को मना पाएंगे, या फिर यह असंतोष सीधे चुनावी नतीजों में तब्दील होकर नुकसान पहुंचाएगा। इतिहास गवाह है कि जब-जब टिकट बंटवारे में न्याय और पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं, तब-तब पार्टी को उसका खामियाजा भुगतना पड़ा है।
फिलहाल चंद्रपुर की राजनीति में यह साफ हो गया है कि बाहर की लड़ाई से पहले अंदर की आग बुझाना सभी दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। यदि समय रहते संवाद और संतुलन नहीं साधा गया, तो यह टिकट विवाद चुनावी रण में भारी पड़ सकता है।




