Tuesday, May 26, 2026

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“भाजपा घुग्घुस में असंतोष की चिंगारी: भाऊ बनाम भैय्या की सियासी जंग में शहर अध्यक्ष की परीक्षा”

प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर – भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के घुग्घुस शहर संगठन में इन दिनों भीतर ही भीतर असंतोष का ज्वार उभर रहा है। जब से नए शहर अध्यक्ष की नियुक्ति हुई है, तब से संगठन में अपेक्षित उत्साह की बजाय खींचतान और मतभेद अधिक नजर आ रहे हैं। कार्यकर्ता आपसी गुटबाज़ी में बंटे हुए हैं और यह स्पष्ट रूप से “भाऊ बनाम भैय्या” की सियासी रस्साकशी बन गई है।

घुग्घुस में भाऊ की साख लंबे समय से मजबूत रही है। हाल ही में भाऊ के जन्मदिन पर जो जनसैलाब उमड़ा, वह इस बात का प्रमाण है कि उनकी लोकप्रियता और पकड़ आज भी मजबूत है। भाऊ के समर्थक सिर्फ संख्या में अधिक नहीं हैं, बल्कि वे क्षेत्र के सामाजिक और राजनीतिक माहौल को भी प्रभावित करने की ताकत रखते हैं।

दूसरी ओर, वर्तमान शहर अध्यक्ष को भैय्या के करीबी और उनके खेमे का कार्यकर्ता माना जाता है। यह बात कार्यकर्ताओं में खुलकर चर्चा का विषय बनी हुई है कि जिस व्यक्ति को संगठन की कमान सौंपी गई है, वह एक खेमे का प्रतिनिधि अधिक है, न कि पूरे शहर का।

यही वजह है कि संगठन के भीतर एक बड़ा वर्ग खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है। जिन कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक पार्टी को जमीनी स्तर पर मज़बूती दी, उन्हें आज किनारे किया जा रहा है — ऐसा आरोप भी लग रहा है।

अब सवाल ये है कि क्या वर्तमान अध्यक्ष इस गुटबाजी को मिटाकर सभी को एकजुट कर पाएंगे? या फिर भाऊ के प्रभाव और कार्यकर्ताओं के दबाव में पार्टी को नए समीकरण गढ़ने पड़ेंगे? यह भी चर्चा में है कि स्थानीय विधायक की भूमिका आने वाले दिनों में निर्णायक हो सकती है।

भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासन और संगठनात्मक एकता रही है। अगर यही दो तत्व स्थानीय स्तर पर दरकने लगें, तो इसका असर सिर्फ घुग्घुस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चंद्रपुर विधानसभा क्षेत्र में भी इसका राजनीतिक मूल्य चुकाना पड़ सकता है।

अध्यक्ष की कुर्सी सिर्फ पद नहीं, बल्कि एक संतुलन साधने की जिम्मेदारी है। आज की परिस्थिति में यह जिम्मेदारी आसान नहीं है। जिन्हें पार्टी ने यह पद सौंपा है, उन्हें अब यह साबित करना होगा कि वे भैय्या के नहीं, बल्कि “सबके अध्यक्ष” हैं।

भाजपा घुग्घुस में फिलहाल जो हालात हैं, वे किसी भी राजनीतिक दल के लिए चेतावनी की तरह हैं। यदि वक्त रहते संवाद और समन्वय की पहल नहीं हुई, तो अंदरूनी असंतोष बाहरी पराजय में बदल सकता है। सवाल यही है कि क्या नेतृत्व इन दरारों को भरने में सफल होगा या स्थिति और बिगड़ेगी?

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Pranaykumar Bandi

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