हर साल 19 जून को संघर्ष में यौन हिंसा के उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस (International Day for the Elimination of Sexual Violence in Conflict) मनाया जाता है। यह दिन उन तमाम पीड़ितों और बचे हुए लोगों को समर्पित है जिन्होंने सशस्त्र संघर्षों के दौरान यौन हिंसा का सामना किया है, और साथ ही उन लोगों को भी जो इस मुद्दे के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं।
घोषणा और उद्देश्य
इस विशेष दिवस को 19 जून 2015 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने आधिकारिक रूप से घोषित किया था। इस तारीख का चुनाव इसलिए किया गया क्योंकि 19 जून 2008 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने सर्वसम्मति से संकल्प 1820 पारित किया था, जिसमें सशस्त्र संघर्षों के दौरान यौन हिंसा को युद्ध रणनीति के रूप में इस्तेमाल किए जाने की निंदा की गई थी।
इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य है:
संघर्षों के दौरान यौन हिंसा के शिकार लोगों के अधिकारों को स्वीकार करना। अपराधियों को सजा दिलाने की मांग करना। समाज में जागरूकता फैलाना कि यौन हिंसा एक हथियार के रूप में इस्तेमाल न हो। बचे हुए लोगों के पुनर्वास और न्याय के लिए समर्थन सुनिश्चित करना।
संघर्ष में यौन हिंसा: एक अमानवीय कृत्य
युद्ध और सशस्त्र संघर्षों के दौरान यौन हिंसा अक्सर एक “रणनीतिक हथियार” के रूप में प्रयोग की जाती है। इसका उद्देश्य विरोधी समुदाय का मनोबल तोड़ना, उन्हें मानसिक रूप से तोड़ना और सामाजिक ढांचे को ध्वस्त करना होता है। यह न सिर्फ पीड़िता/पीड़ित के शरीर पर हमला है, बल्कि उनकी आत्मा, पहचान और गरिमा पर भी आघात है।
महत्व और वैश्विक प्रयास
इस अंतर्राष्ट्रीय दिवस के माध्यम से दुनिया भर में सरकारें, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं, मानवाधिकार कार्यकर्ता और नागरिक समाज एकजुट होकर संघर्ष-पीड़ित समुदायों की आवाज़ बनते हैं।
संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिनिधि प्रणीते हैं जो युद्ध और संघर्ष में यौन हिंसा के मामलों की निगरानी करती हैं और पीड़ितों के लिए न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में काम करती हैं।
भारत और यौन हिंसा के खिलाफ जागरूकता
भारत भी इस मुद्दे को गंभीरता से लेता है। चाहे वो कश्मीर हो या पूर्वोत्तर, यहां भी समय-समय पर सुरक्षा बलों और उग्रवादियों द्वारा यौन हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं। हाल के वर्षों में देश में जागरूकता बढ़ी है और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए कड़े कानून बनाए गए हैं।
19 जून सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक पुकार है – न्याय की, गरिमा की, और मानवाधिकारों की रक्षा की। संघर्ष की परिस्थिति में यौन हिंसा को रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है। जब तक हर पीड़ित को न्याय नहीं मिलता और समाज ऐसे अपराधों के खिलाफ एकजुट नहीं होता, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा।
“चुप्पी को तोड़ना ही बदलाव की पहली सीढ़ी है।”
इस दिन हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि संघर्ष में यौन हिंसा के खिलाफ आवाज़ बुलंद करेंगे और एक सुरक्षित, गरिमामय दुनिया की ओर कदम बढ़ाएंगे।
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