Serious Questions Over Public Toilet Repairs in Ghugghus Municipal Council, Row Erupts Over ₹5–6 Lakh Project Cost
प्रभाग क्रमांक 10 में महीनों से अधूरा पड़ा शौचालय, नागरिक परेशान;
स्थानीय नेताओं ने लगाए भ्रष्टाचार के आरोप, 11 प्रभागों के सभी कार्यों की जांच की मांग
प्रणयकुमार बंडी

घुग्घूस, चंद्रपुर : महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले की घुग्घूस नगर परिषद एक बार फिर कथित अनियमितताओं को लेकर चर्चा में है। नगर परिषद के प्रभाग क्रमांक.10 में KGN स्क्रैप के सामने तथा बहादे लेआउट के पास स्थित सार्वजनिक शौचालयों की मरम्मत का काम पिछले कई महीनों से अधूरा पड़ा होने का आरोप है। बताया जा रहा है कि इन कार्यों के लिए करीब पौने छह लाख रुपये की राशि निर्धारित की गई है। हालांकि, काम की वास्तविक प्रगति और खर्च को लेकर अब सवाल खड़े होने लगे हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सार्वजनिक उपयोग के लिए वर्षों पहले बनाए गए इन शौचालयों की मरम्मत लंबे समय से अधूरी है। ऐसे में रोजमर्रा की जरूरत के लिए नागरिकों, विशेषकर महिलाओं और बुजुर्गों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। आरोप है कि शौचालय बंद अथवा अनुपयोगी होने के कारण कुछ नागरिकों को मजबूरी में खुले में शौच के लिए जाना पड़ रहा है।
कागजों में लाखों, जमीन पर काम कितना?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि मरम्मत कार्य पर करीब पौने छह लाख रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तो वास्तव में इसमें कितना काम हुआ और उस पर कितना खर्च आया?
शिंदे गुट के घुग्घूस शहर प्रमुख एवं ठेकेदार महेश डोंगे द्वारा बताए गए अनुमान के अनुसार, विभिन्न कामों की अधिकतम लागत इससे काफी कम बैठती है।
डोंगे के मुताबिक— सिंटेक्स, पाइपलाइन और मजदूरी — अधिकतम ₹30,000., मटेरियल, प्लास्टर एवं रोजाना मजदूरी — अधिकतम ₹50,000., लैटरीन शीट व मजदूरी — लगभग ₹15,000., टाइल्स एवं मजदूरी — अधिकतम ₹40,000., पेंटिंग एवं लेबर चार्ज — अधिकतम ₹20,000., इलेक्ट्रिक वर्क — अधिकतम ₹10,000., शौचालय परिसर के आसपास जंगल एवं कचरा सफाई — करीब ₹25,000., शौच गड्ढों की लागत — अधिकतम ₹20,000.
इन सभी मदों को जोड़ने पर अनुमानित खर्च करीब ₹2.10 लाख बैठता है। ऐसे में यदि वास्तविक ठेका राशि करीब ₹5.75 लाख है, तो दोनों के बीच लगभग ₹3.65 लाख का अंतर दिखाई देता है। हालांकि, वास्तविक लागत का निर्धारण केवल अधिकृत तकनीकी अनुमान, बिल, माप पुस्तिका, निविदा दस्तावेज और भुगतान रिकॉर्ड की जांच के बाद ही हो सकता है।
“11 प्रभागों के सभी शौचालयों की जांच हो”
महेश डोंगे ने आरोप लगाया है कि घुग्घूस नगर परिषद के 11 प्रभागों में चल रहे सार्वजनिक शौचालयों के मरम्मत एवं पेंटिंग कार्यों की अनिवार्य रूप से जांच होनी चाहिए।
उनका कहना है कि यदि जांच में अनियमितता या वित्तीय गड़बड़ी सामने आती है, तो संबंधित सिविल विभाग के अधिकारी और कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि स्थानीय स्तर पर उचित कार्रवाई नहीं हुई, तो मामले को मंत्रालय स्तर तक ले जाकर अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए पत्राचार किया जाएगा।
“घुग्घूस नगर परिषद में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार” का आरोप
वहीं अमित बोरकर ने इससे भी गंभीर आरोप लगाते हुए घुग्घूस नगर परिषद को महाराष्ट्र की सबसे भ्रष्ट नगर परिषदों में से एक बताया है। उनका आरोप है कि सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण और मरम्मत के लिए निर्धारित राशि वास्तविक आवश्यकता से दो से तीन गुना अधिक है।
बोरकर का दावा है कि कथित अनियमितताओं में जनप्रतिनिधियों के साथ नगर परिषद के अधिकारी और कर्मचारियों की मिलीभगत की जांच की जानी चाहिए। उनका कहना है कि मामला केवल प्रभाग क्रमांक 10 तक सीमित नहीं है, बल्कि नगर परिषद के सभी 11 प्रभागों में हुए सार्वजनिक शौचालयों के कार्यों की जांच होनी चाहिए।
अब जांच से खुलेगा ‘लाखों’ के खर्च का राज
सार्वजनिक शौचालय जैसी मूलभूत सुविधा महीनों तक अधूरी रहना अपने आप में नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। उससे भी बड़ा सवाल है—जिस काम पर लाखों रुपये खर्च होने का दावा है, उसकी वास्तविक गुणवत्ता और लागत क्या है?
अब जरूरत केवल आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि निविदा प्रक्रिया, वर्क ऑर्डर, तकनीकी मंजूरी, एस्टीमेट, माप पुस्तिका (MB), बिल, भुगतान रिकॉर्ड और मौके पर हुए वास्तविक काम का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराने की है।
यदि रिकॉर्ड और जमीन पर हुए काम में अंतर पाया जाता है तो जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। वहीं यदि आरोप गलत साबित होते हैं, तो इसकी स्थिति भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
अमित बोरकर ने चेतावनी दी है कि यदि कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं की गई, तो इसके विरोध में तीव्र आंदोलन किया जाएगा और इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।
अब सवाल सीधा है—शौचालय की मरम्मत के नाम पर लाखों रुपये का हिसाब आखिर कौन देगा?




