कार्यालय परिसर में एक अटॉर्नी के लिए टेबल-चेयर की व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज;
चुनाव से पहले कार्यालय संचालन और शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होने से अधिकारियों की भूमिका पर सवाल

प्रणयकुमार बंडी
घुग्घूस, चंद्रपुर : घुग्घूस नगर परिषद कार्यालय का प्रांगण इन दिनों विकास कार्यों से ज्यादा एक अलग ही चर्चा का केंद्र बना हुआ है। नगर परिषद परिसर में कथित तौर पर चल रही ‘अटॉर्नी पद्धति’ को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि नगर परिषद परिसर में एक अटॉर्नी के लिए बाकायदा टेबल और चेयर की व्यवस्था की जा सकती है, तो अन्य अटॉर्नियों के साथ समान व्यवहार क्यों नहीं?
चर्चा यह भी है कि नगर परिषद कार्यालय परिसर में एक अटॉर्नी को अन्य लोगों की तुलना में विशेष सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। यदि यह व्यवस्था वास्तव में नगर परिषद प्रशासन की अनुमति से की गई है, तो इसका आधार क्या है? और यदि किसी नियम, आदेश या प्रशासनिक अनुमति के तहत यह सुविधा दी गई है, तो वही सुविधा अन्य अटॉर्नियों को क्यों नहीं?
एक के लिए टेबल-चेयर, बाकी ‘चलते-फिरते’ क्यों?
नगर परिषद कार्यालय में आने वाले अटॉर्नियों के लिए समान अवसर और समान व्यवहार प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। लेकिन यदि किसी एक व्यक्ति के लिए कार्यालय परिसर में स्थायी रूप से टेबल और चेयर की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है और अन्य अटॉर्नियों को ऐसी सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो स्वाभाविक रूप से भेदभाव की चर्चा होना गलत नहीं कहा जा सकता।
सवाल सीधा है—नगर परिषद का परिसर सार्वजनिक प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है या किसी विशेष व्यक्ति के लिए सुविधा केंद्र? यदि नगर परिषद प्रशासन के पास इस व्यवस्था का कोई स्पष्ट नियम या आदेश है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि उठ रहे सवालों पर विराम लग सके।
चुनाव से पहले कार्यालय और चुनाव परिणाम के बाद हटाने की चर्चा
इस पूरे मामले को लेकर एक और गंभीर चर्चा स्थानीय स्तर पर सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि नगर परिषद चुनाव से पहले नगर परिषद कार्यालय के ठीक सामने, कथित तौर पर कांजी/कांजी लगाकर एक कार्यालय संचालित किया जा रहा था।
चर्चा के अनुसार चुनाव परिणाम घोषित होने के लगभग एक महीने बाद कथित रूप से उस कार्यालय को हटा दिया गया। यहां सवाल केवल कार्यालय हटने का नहीं है। असली सवाल यह है कि—क्या वह कार्यालय अधिकृत था? क्या नगर परिषद से इसकी अनुमति ली गई थी? यदि अनुमति थी तो किस आधार पर? और यदि अनुमति नहीं थी तो चुनाव से पहले उस कथित कार्यालय के संचालन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इन सवालों का स्पष्ट जवाब नगर परिषद प्रशासन को देना चाहिए।
सबूत के साथ शिकायत के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं?
मामला तब और गंभीर हो जाता है जब यह दावा किया जाता है कि संबंधित विषय को लेकर सबूतों के साथ शिकायत की गई और अधिकारियों को ज्ञापन/निवेदन भी दिए गए, लेकिन इसके बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
यदि शिकायत गलत थी तो उसे जांच के बाद खारिज किया जा सकता था। यदि शिकायत में तथ्य पाए गए तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए थी। लेकिन शिकायतों पर कार्रवाई ही न होना अपने आप में प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है। क्या शिकायतों को फाइलों में दबाकर रखने की कोई नई प्रशासनिक पद्धति शुरू हो गई है? जनता को यह जानने का अधिकार है कि शिकायत पर क्या जांच हुई, किस अधिकारी ने जांच की, क्या निष्कर्ष निकला और कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
सत्ता पक्ष ही नहीं, विरोधी पक्ष की भूमिका पर भी सवाल
इस मामले में सवाल केवल नगर परिषद प्रशासन तक सीमित नहीं हैं। सत्ता पक्ष के साथ-साथ विरोधी पक्ष की भूमिका पर भी चर्चा होना स्वाभाविक है। यदि नगर परिषद परिसर में किसी एक व्यक्ति को विशेष सुविधा दिए जाने की बात सामने आती है, तो सत्ता पक्ष से जवाब की अपेक्षा की जाएगी। लेकिन दूसरी ओर यदि विपक्ष इस मुद्दे पर आवाज उठाने में असफल रहता है, तो उसकी भूमिका पर भी सवाल उठेंगे। जनता ने जनप्रतिनिधियों को सवाल पूछने और व्यवस्था पर निगरानी रखने के लिए चुना है, न कि चुप्पी साधने के लिए। नगर परिषद में सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों की जिम्मेदारी है कि प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और समानता सुनिश्चित हो।
मुख्याधिकारी की भूमिका पर भी उठ रही उंगली
पूरे मामले में नगर परिषद के मुख्याधिकारी की भूमिका भी चर्चा में है। स्थानीय स्तर पर यह आरोप/चर्चा सामने आ रही है कि प्रशासनिक निर्णयों में मुख्याधिकारी की भूमिका किसी एक राजनीतिक पक्ष की ओर झुकी हुई दिखाई दे रही है।
हालांकि यह एक गंभीर आरोप है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। इसलिए मुख्याधिकारी से भी अपेक्षा है कि वे सामने आकर स्पष्ट करें कि— – नगर परिषद परिसर में अटॉर्नी के लिए टेबल-चेयर किस आदेश के तहत उपलब्ध कराई गई? – क्या अन्य अटॉर्नियों को भी समान सुविधा देने का प्रावधान है? – चुनाव से पहले नगर परिषद कार्यालय के सामने कथित कार्यालय किसकी अनुमति से चल रहा था? – चुनाव परिणाम के बाद उसे हटाने का कारण क्या था? – प्राप्त शिकायतों पर क्या जांच की गई? – शिकायतकर्ता को कार्रवाई की जानकारी क्यों नहीं दी गई? – क्या इस पूरे मामले में किसी राजनीतिक दबाव का प्रभाव है? इन सवालों का जवाब मिलने पर ही प्रशासन के प्रति उठ रहे संदेह दूर हो सकते हैं।
कलेक्टर के सामने अब बड़ी चुनौती
अब नजरें जिला प्रशासन, विशेषकर जिलाधिकारी पर टिकी हुई हैं। यदि घुग्घूस नगर परिषद से संबंधित शिकायतें, ज्ञापन और निवेदन लगातार प्रशासन के संज्ञान में आ रहे हैं, तो इनकी निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है। जिलाधिकारी को चाहिए कि वे घुग्घूस नगर परिषद की कार्यपद्धति, शिकायतों के निपटारे, कार्यालय परिसर में दी जा रही सुविधाओं और प्रशासनिक निर्णयों की निष्पक्ष जांच करवाएं।
सवाल किसी एक अटॉर्नी को सुविधा देने या हटाने का नहीं है। सवाल इससे बड़ा है—क्या नगर परिषद की व्यवस्था नियमों के अनुसार चल रही है या फिर व्यक्ति और राजनीतिक समीकरण के आधार पर?
‘सिस्टम’ सुधारना है तो निष्पक्षता दिखानी होगी
नगर परिषद किसी व्यक्ति, पार्टी या गुट की निजी संस्था नहीं है। यह जनता के पैसों से चलने वाली स्थानीय स्वशासी संस्था है। यहां हर व्यक्ति के साथ समान व्यवहार होना चाहिए।
यदि एक अटॉर्नी को टेबल-चेयर मिलती है तो नियम के तहत अन्य पात्र अटॉर्नियों को भी समान अवसर मिलना चाहिए। यदि किसी कार्यालय को हटाया गया है तो उसके पीछे का प्रशासनिक आदेश और कारण सार्वजनिक होना चाहिए। और यदि किसी शिकायत में सबूत प्रस्तुत किए गए हैं तो उसकी जांच का परिणाम शिकायतकर्ता और जनता के सामने आना चाहिए। वरना सवाल उठते रहेंगे और नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर संदेह गहराता जाएगा।
अब घुग्घूस की जनता की निगाहें जिलाधिकारी की ओर हैं।
क्या जिलाधिकारी घुग्घूस नगर परिषद में चल रही कथित कार्यपद्धति, शिकायतों, ज्ञापनों और निवेदनों की वास्तविक स्थिति का जायजा लेंगी? क्या नगर परिषद परिसर में अटॉर्नियों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित किया जाएगा? क्या चुनाव से पहले संचालित कथित कार्यालय की जांच होगी? और सबसे अहम—क्या शिकायतों पर कार्रवाई न होने की जिम्मेदारी तय होगी?
इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में मिलना जरूरी है। क्योंकि मामला केवल एक टेबल और चेयर का नहीं, बल्कि नगर परिषद में नियम, निष्पक्षता और प्रशासनिक पारदर्शिता के अस्तित्व का है।




