प्रणयकुमार बंडी
घुग्घूस/चंद्रपुर: चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा जारी किए जाने वाले घोषणापत्रों में जनता के लिए अनेक आकर्षक वादे किए जाते हैं। इन्हीं वादों में सत्ता पक्ष के घोषणापत्र का एक महत्वपूर्ण मुद्दा था – “दारिद्र्य रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाली गरीब, निराधार महिलाओं और परिवारों को अंतिम संस्कार हेतु मुफ्त लकड़ी उपलब्ध कराई जाएगी अथवा 3000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी।”
चुनाव को लगभग छह महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब यह सवाल उठने लगा है कि घोषणापत्र का यह 26वां वादा आखिर किस स्थिति में है? क्या गरीब और निराधार परिवारों को वास्तव में इस योजना का लाभ मिला है, या यह घोषणा भी चुनावी वादों की लंबी सूची में कहीं खो गई है?
घुग्घूस एक औद्योगिक क्षेत्र होने के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी गंभीर चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। सरकारी और निजी स्वास्थ्य संस्थानों के आंकड़े बताते हैं कि क्षेत्र में दमा, त्वचा रोग, बाल झड़ना, कैंसर, हृदयाघात, किडनी और लीवर संबंधी बीमारियां, सड़क दुर्घटनाएं तथा मानसिक तनाव से जुड़ी घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर अंतिम संस्कार का खर्च भी एक बड़ी चुनौती बन जाता है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि ऐसी सहायता योजना वास्तव में लागू की गई है तो नगर परिषद प्रशासन को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि अब तक कितने परिवारों को इसका लाभ मिला, कितनी राशि वितरित की गई और किन मानकों के आधार पर सहायता प्रदान की गई। फिलहाल इस संबंध में कोई विस्तृत आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं दिखाई देती।
शहर में यह चर्चा भी है कि नगर परिषद प्रशासन की प्राथमिकताएं आखिर क्या हैं? ग्रामीण काल से लेकर नगर परिषद बनने तक शहर के दीर्घकालीन विकास और सामाजिक योजनाओं की क्या रूपरेखा तैयार की गई है? चुनावी वादों और जमीनी वास्तविकता के बीच की दूरी को लेकर नागरिकों में सवाल बढ़ रहे हैं।
आम लोगों का मानना है कि केवल घोषणाएं करने से विकास नहीं होता, बल्कि योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन ही जनता का विश्वास जीतता है। यदि अंतिम संस्कार सहायता योजना लागू है तो उसकी पारदर्शी जानकारी सामने आनी चाहिए और यदि किसी कारणवश योजना शुरू नहीं हो सकी है तो उसके कारण भी जनता को बताए जाने चाहिए।
शहर के कई नागरिक यह भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या नगर परिषद के जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि केवल फाइलों और बैठकों तक सीमित हैं, या वास्तव में जमीनी स्तर पर योजनाओं की समीक्षा और क्रियान्वयन पर भी ध्यान दिया जा रहा है? विकास, नियोजन और जनकल्याण से जुड़े कई मुद्दे आज भी चर्चा का विषय बने हुए हैं।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि घोषणापत्र का 26वां वादा छह महीने बाद किस स्थिति में है? गरीब और निराधार परिवारों को मुफ्त लकड़ी या 3000 रुपये की सहायता वास्तव में मिल रही है या नहीं? यदि मिल रही है तो कितनों को मिली और यदि नहीं मिल रही तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर जनता की निगाहें सत्ता पक्ष और नगर परिषद प्रशासन दोनों पर टिकी रहेंगी। आखिर चुनावी वादों की कसौटी पर राजनीति खरी उतरती है या जनता के सवाल? इसका जवाब अब केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत ही देगी।




