प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर: चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा जनता से किए गए वादों को लेकर बड़े-बड़े घोषणापत्र जारी किए जाते हैं। आकर्षक नारों और विकास के दावों के बीच मतदाताओं को सुनहरे सपने दिखाए जाते हैं। लेकिन चुनाव समाप्त होने के बाद उन्हीं वादों की जमीनी हकीकत क्या है, यह सवाल अक्सर जनता के मन में उठता है।
घुग्घुस नगर परिषद चुनाव 2025 के दौरान जारी किए गए एक घोषणापत्र में कुल 37 विकासात्मक मुद्दों को प्रमुखता से रखा गया था। इनमें क्रमांक 23 पर “साप्ताहिक बाजार में पार्किंग की व्यवस्था की जाएगी” का वादा भी शामिल था। चुनाव को पांच महीने से अधिक समय बीत चुके हैं, लेकिन यह वादा आज भी कागजों तक सीमित दिखाई दे रहा है।
बाजार बढ़ा, लेकिन सुविधाएं नहीं
घुग्घुस में वर्षों से प्रत्येक रविवार को लगने वाला साप्ताहिक बाजार आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों नागरिकों और व्यापारियों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। हर वर्ष नगर परिषद इस बाजार का ठेका लाखों रुपये में नीलामी के माध्यम से देती है। राजस्व वसूली तो नियमित रूप से हो रही है, लेकिन बाजार में आने वाले नागरिकों के लिए मूलभूत सुविधाओं का अभाव साफ दिखाई देता है।
सबसे बड़ी समस्या पार्किंग की है। बाजार के दिन एसीसी मार्ग, बुरड़ की दुकानों के आसपास, पंचशील चौक, कॉलरी नंबर-2 स्कूल क्षेत्र तथा अन्य प्रमुख मार्गों पर वाहन अव्यवस्थित रूप से खड़े दिखाई देते हैं। इससे न केवल यातायात प्रभावित होता है बल्कि किसी बड़ी दुर्घटना की आशंका भी लगातार बनी रहती है।
फाइलों में बंद शिकायतें?
स्थानीय नागरिकों ने कई बार पुलिस प्रशासन और नगर परिषद से रविवार के दिन भारी वाहनों के प्रवेश पर नियंत्रण तथा यातायात व्यवस्था सुधारने की मांग की है। लेकिन नागरिकों का आरोप है कि ये मांगें केवल फाइलों की शोभा बढ़ा रही हैं। जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही।
जनता पूछ रही है कि यदि बाजार से राजस्व प्राप्त हो रहा है तो पार्किंग, स्वच्छ पेयजल, शौचालय और यातायात प्रबंधन जैसी सुविधाएं क्यों उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं?
टाउन प्लानिंग पर उठे सवाल
शहर के जानकारों का मानना है कि बाजार क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक योजना और व्यवस्थित टाउन प्लानिंग का अभाव इस समस्या की मुख्य वजह है। बढ़ती भीड़ और वाहनों की संख्या को देखते हुए पार्किंग की समुचित व्यवस्था समय की आवश्यकता बन चुकी है।
लेकिन फिलहाल ऐसा कोई स्पष्ट खाका या योजना सामने नहीं आई है जिससे यह विश्वास हो सके कि निकट भविष्य में इस वादे को अमलीजामा पहनाया जाएगा।
जनता का भरोसा या राजनीतिक सपना?
चुनाव के दौरान किए गए वादे जनता के विश्वास का आधार होते हैं। ऐसे में “साप्ताहिक बाजार में पार्किंग व्यवस्था” का वादा केवल राजनीतिक घोषणा बनकर रह जाएगा या वास्तव में धरातल पर दिखाई देगा, इस पर अब आम नागरिकों की नजर टिकी हुई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि विकास केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले कार्यों से साबित होता है। यदि पांच महीने बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रशासन की भूमिका भी कटघरे में
नगर परिषद के मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, सभापति, अभियंता और संबंधित विभागों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। नागरिकों का कहना है कि कार्यालयों में बैठकर कागजी प्रक्रियाओं तक सीमित रहने के बजाय जमीनी समस्याओं के समाधान पर ध्यान देना आवश्यक है।
जनविकास, यातायात प्रबंधन और बाजार नियोजन जैसे विषयों पर ठोस पहल नहीं होने से प्रशासनिक कार्यशैली पर भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
अब जनता करेगी फैसला
घोषणापत्र के 23वें मुद्दे की सफलता या असफलता का मूल्यांकन आने वाले समय में जनता स्वयं करेगी। फिलहाल यह मुद्दा सत्ता पक्ष की परीक्षा बन चुका है। जनता यह देख रही है कि वादा करने वाले अपने शब्दों पर कितने खरे उतरते हैं।
आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि जनता को दिखाया गया सपना विकास में बदला या फिर वह केवल चुनावी राजनीति का एक और अध्याय बनकर रह गया। आखिरकार, जनता सही थी या राजनीति — इसका जवाब आने वाले पांच वर्षों में किए गए कार्य तय करेंगे।




