घुग्घुस में विकास के दावों और वास्तविकता के बीच बढ़ता अंतर, नगर परिषद की भूमिका पर उठ रहे सवाल
प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा जारी किए जाने वाले घोषणा-पत्र (जाहिरनामा) जनता के सामने विकास की दिशा और प्राथमिकताओं का खाका पेश करते हैं। इन्हीं वादों के आधार पर मतदाता अपना विश्वास व्यक्त करते हैं। वर्ष 2025 के चुनावी घोषणा-पत्र में प्रकाशित 37 आकर्षक मुद्दों में से क्रमांक 16 पर स्पष्ट रूप से कहा गया था कि “पाणीटंचाईवर मात करण्यासाठी पाणी साठवण प्रणाली (रेन वॉटर हार्वेस्टिंग) कडे विशेष लक्ष देण्यात येईल।” अर्थात जल संकट से निपटने के लिए वर्षा जल संचयन व्यवस्था को विशेष महत्व दिया जाएगा।
लेकिन चुनावी वादे और घुग्घुस की जमीनी स्थिति के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। नगर परिषद क्षेत्र के 11 प्रभागों में स्थित अधिकांश मकानों और इमारतों में आज भी रेन वॉटर हार्वेस्टिंग की प्रभावी व्यवस्था नजर नहीं आती। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस मुद्दे को चुनावी प्राथमिकता बताया गया था, उस पर अब तक कितना काम हुआ?
भारत में जल संकट को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारें वर्षों से वर्षा जल संचयन को बढ़ावा दे रही हैं। महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में भवन निर्माण अनुमति के दौरान रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को आवश्यक शर्तों में शामिल किया गया है। नगर परिषदों और स्थानीय निकायों को इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है। इसके बावजूद यदि बड़ी संख्या में भवन बिना वर्षा जल संचयन व्यवस्था के खड़े हैं, तो यह केवल नागरिकों की उदासीनता का विषय नहीं बल्कि प्रशासनिक निगरानी पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
नियमों के अनुसार जहां रेन वॉटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य है, वहां उसका पालन नहीं होने पर भवन अनुमति, पूर्णता प्रमाणपत्र, जुर्माना, नोटिस अथवा अन्य कानूनी कार्रवाई जैसे प्रावधान मौजूद हैं। लेकिन घुग्घुस में ऐसे नियमों का पालन कितना हो रहा है और कितनी कार्रवाई हुई है, यह सवाल आज भी अनुत्तरित है।
टाउन प्लानिंग, जनविकास और नगर नियोजन से जुड़े विभागों की भूमिका भी चर्चा का विषय बनती जा रही है। यदि शहर में जल संरक्षण की योजनाएं केवल कागजों तक सीमित हैं और जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव दिखाई नहीं देता, तो स्वाभाविक रूप से नागरिकों के मन में प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर संदेह पैदा होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रत्येक भवन में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग व्यवस्था लागू हो जाए तो भूजल स्तर में सुधार, जल संकट में कमी और पर्यावरण संरक्षण को बड़ा लाभ मिल सकता है। इसके विपरीत यदि योजनाएं केवल बैठकों, प्रस्तावों और घोषणा-पत्रों तक सीमित रहें तो उनका उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
घुग्घुस में स्थानीय लोगों के साथ न्याय हो रहा है या नहीं, विकास योजनाओं का लाभ वास्तव में जनता तक पहुंच रहा है या नहीं, और प्रशासन अपनी जिम्मेदारियां प्रभावी ढंग से निभा रहा है या नहीं—ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब जनता आने वाले वर्षों में अपने अनुभवों के आधार पर तय करेगी।
फिलहाल चुनावी घोषणा-पत्र के 16वें मुद्दे — “पाणीटंचाईवर मात करण्यासाठी पाणी साठवण प्रणाली (रेन वॉटर हार्वेस्टिंग) कडे विशेष लक्ष देण्यात येईल” — की सफलता पर प्रश्नचिह्न बना हुआ है। क्या यह वादा पहले वर्ष में ही धरातल पर उतर पाया है, या अभी भी योजनाओं और वास्तविकता के बीच दूरी बनी हुई है? इसका स्पष्ट उत्तर आने वाला समय देगा।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि जल संरक्षण का यह महत्वपूर्ण मुद्दा विकास की प्राथमिकता बनता है या फिर अन्य कई चुनावी वादों की तरह फाइलों और भाषणों तक सीमित रह जाता है। आखिरकार जनता सही है या राजनीति, इसका फैसला सत्ता पक्ष के पांच वर्षों के जमीनी कार्य ही करेंगे।




