Tuesday, May 26, 2026

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घुग्घुस नगर परिषद: अब जवाबदेही या फिर वही पुरानी उदासीनता?

जनादेश के बाद उम्मीदें, सवाल और कड़े कानूनन दायित्व

(प्रणयकुमार बंडी)

घुग्घुस नगर परिषद की स्थापना के बाद बीते कई वर्षों तक शहर में विकास “नाम मात्र” ही नजर आया। कारण साफ था—नगर परिषद के गठन के बाद नियमित चुनाव नहीं हुए और शहर की बागडोर प्रशासक के हाथों में रही। जिन प्रशासकों और मुख्याधिकारियों पर विकास की जिम्मेदारी थी, वे उस गति और संवेदनशीलता से काम नहीं कर पाए, जिसकी अपेक्षा जनता को थी। नतीजा यह हुआ कि निवेदन, अर्ज, ज्ञापन और शिकायतों की फाइलें अलमारियों में धूल फांकती रहीं और नागरिक समस्याएँ जस की तस बनी रहीं।

लेकिन अब परिदृश्य बदला है। हाल ही में घुग्घुस नगर परिषद चुनाव 2025 संपन्न हुआ और जनता ने सीधे (थेठ) तरीके से अपना नगराध्यक्ष चुना। 07 जनवरी 2026 को नगराध्यक्ष और उपनगराध्यक्ष ने विधिवत पदग्रहण किया। अभी समितियों का गठन शेष है, परंतु सत्ता अब प्रशासक से जनप्रतिनिधियों के हाथों में आ चुकी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या बीते 5 वर्षों से लंबित जनसमस्याओं पर अब ठोस कार्रवाई होगी, या फिर नगर परिषद भी “आँख मूंदकर बैठने” की परंपरा को आगे बढ़ाएगी?

समस्याओं की लंबी फेहरिस्त, जवाबदेही की कड़ी परीक्षा

घुग्घुस में नागरिक समस्याओं की सूची छोटी नहीं, बल्कि वर्षों की उपेक्षा का दस्तावेज है।
पेयजल संकट, स्वच्छता की बदहाली, अवैध बांधकाम, शहर का सौंदर्यीकरण, अवैध साहूकारों पर कार्रवाई, समाज भवन और सार्वजनिक शौचालयों का अभाव, शराब की दुकानों का अनियंत्रित संचालन, निजी तालाबों की गंदगी और सौंदर्यीकरण, जर्जर नालियाँ और सड़कें, स्ट्रीट लाइट की खराब व्यवस्था—ये सब मुद्दे केवल शिकायत नहीं, बल्कि नगर परिषद की कार्यक्षमता पर सीधा प्रश्नचिह्न हैं।

इसके साथ ही एक ही काम को बार-बार करना, अर्थहीन और गुणवत्ताहीन निर्माण, भूस्खलन पीड़ितों को न्याय न मिलना, घर पट्टों का लंबित मामला, अवैध लेआउट डालकर लोगों से ठगी कर विकास न करना, लोहा पुलिया जैसी बुनियादी संरचनाओं की अनदेखी, औद्योगिक प्रदूषण, सड़कों पर अवैध वाहन पार्किंग—ये सभी विषय अब केवल चर्चा का नहीं, तत्काल कार्रवाई का विषय हैं।

कानून क्या कहता है? नगर परिषद की जिम्मेदारी क्या है?

महाराष्ट्र नगर परिषद, नगर पंचायत एवं औद्योगिक नगर अधिनियम, 1965 के तहत नगर परिषद पर स्पष्ट कानूनी दायित्व हैं।

धारा 49 के अनुसार, स्वच्छता, जल आपूर्ति, सड़क, प्रकाश व्यवस्था, नालियाँ और सार्वजनिक स्वास्थ्य नगर परिषद के अनिवार्य कर्तव्य हैं।

अवैध निर्माण, अवैध होर्डिंग-बैनर, पोस्टर, अवैध भंगार दुकानें और अतिक्रमण पर कार्रवाई करना परिषद की वैधानिक जिम्मेदारी है।

शराब दुकानों के समय निर्धारण, सार्वजनिक शांति और नैतिकता बनाए रखने के लिए परिषद को राज्य कानूनों के अनुरूप प्रस्ताव और अनुशंसा करने का अधिकार है।

प्रदूषण नियंत्रण, औद्योगिक नियमों के पालन हेतु संबंधित विभागों के साथ समन्वय भी नगर परिषद का कर्तव्य है।

यदि इन दायित्वों के बावजूद परिषद निष्क्रिय रहती है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि कानूनी लापरवाही की श्रेणी में आएगा।

अब बहाने नहीं, परिणाम चाहिए

नागरिकों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या नए नगराध्यक्ष, उपनगराध्यक्ष और आगामी समितियाँ उन सभी निवेदनों, अर्जों और ज्ञापनों को गंभीरता से लेंगी, जो वर्षों से लंबित पड़े हैं?
क्या अवैध शराब दुकानों, अवैध वसूली (डेली-वीकली के नाम पर), अवैध होर्डिंग और पोस्टरों पर सख्त कार्रवाई होगी?
क्या श्री छत्रपति शिवाजी महाराज की पूर्णाकृति प्रतिमा जैसे सांस्कृतिक और गौरवपूर्ण विषयों पर ठोस निर्णय लिया जाएगा?

जनादेश चेतावनी भी है

घुग्घुस की जनता ने सीधे नगराध्यक्ष चुनकर एक स्पष्ट संदेश दिया है—अब शहर “प्रशासकीय सुस्ती” नहीं, बल्कि जवाबदेह शासन चाहता है। यह जनादेश केवल कुर्सी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है।
यदि नगर परिषद ने अब भी आँख मूंदे रखीं, तो यह जनभावनाओं का अपमान होगा। और यदि कानून के दायरे में रहकर साहसिक निर्णय लिए गए, तो यही परिषद घुग्घुस के विकास की नई इबारत लिख सकती है।

अब वक्त है—फाइलें खोलने का, फैसले लेने का और ज़मीन पर काम दिखाने का।

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Pranaykumar Bandi

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