घुग्घुस की राजनीति: सत्ता की होड़ में संगठन, सिद्धांत और साख दांव पर
(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घुस नगर परिषद की राजनीति इन दिनों जनसेवा से ज्यादा गुटबाजी, सौदेबाज़ी और सत्ता हथियाने की होड़ का अखाड़ा बनती जा रही है। कांग्रेस के भीतर बने दो स्पष्ट गुट और तीसरे मोर्चे के रूप में भाजपा का सक्रिय होना, यह संकेत देता है कि लोकतांत्रिक मूल्यों से ज़्यादा “कौन जीतेगा कुर्सी” की चिंता हावी है।
पहले गुट में कांग्रेस के नगरसेवक राजीरेड्डी प्रोद्दाटूरी, आशा पानघाटे, नूरुल सिद्दीकी, सुनीता पेंदोर, पल्लवी गुले, नगर अध्यक्ष दीप्ति सोनटक्के और अपक्ष नगरसेवक माला मेश्राम व पंकज धोटे शामिल हैं।
दूसरे गुट में कांग्रेस के रोशन पचारे, सूरज कन्नूर, दिलीप पिट्टलवार, वैशाली चिकनकर, अर्चना सारोकर, श्रुतिका कलवल और एनसीपी (अजित पवार गुट) के रवीश सिंग व शुभांगी सारसर हैं।
इन दोनों गुटों की संख्या बल देखकर यह साफ है कि कांग्रेस को दोनों स्वीकृत पद मिलने की संभावनाएं मजबूत हो चुकी हैं। राजनीतिक गलियारों में इस पूरी रणनीति का श्रेय प्रतिभा धनोरकर को दिया जा रहा है, जिन्हें इस समीकरण का “मास्टरस्ट्रोक” माना जा रहा है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 5 जनवरी 2026 की देर शाम से सोशल मीडिया पर वायरल हो रही पोस्टों ने पूरे घुग्घुस में सियासी भूचाल ला दिया है। कांग्रेस के ही कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा की जा रही चर्चाओं ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—
क्या वाकई शहर अध्यक्ष अपने समर्थकों के साथ राजीनामा देने की तैयारी में हैं?
या फिर वे पार्टी के भीतर ही अपना लोहा मनवाकर विरोधियों को पीछे छोड़ देंगे?
सबसे अहम सवाल यह है कि इस आपसी खींचतान में नुकसान किसका होगा—किसी एक स्वीकृत पद का या फिर पूरी पार्टी की साख का? जिस तरह से अंदरूनी कलह खुलेआम सोशल मीडिया पर उछाली जा रही है, वह कांग्रेस की छवि को भारी नुकसान पहुंचा रही है। जनता के मुद्दे पीछे छूट गए हैं और चर्चा सिर्फ कुर्सी की है।
इधर तीसरे गुट के रूप में भाजपा भी चुप बैठने वाली नहीं है। मीणा मोरपाका, विवेक बोडे, सातपुते, मधु तिवारी, गणेश पिंपलकर, वैशाली डावास और आशीष माशिरकर जैसे नाम इस बात का संकेत हैं कि भाजपा भी अपने स्वीकृत पद के लिए बड़ा दांव खेलने की तैयारी में है। सवाल यह है कि भाजपा कौन-सा नया मास्टरस्ट्रोक लाएगी, जो कांग्रेस की अंदरूनी कलह का फायदा उठा सके।
कुल मिलाकर, घुग्घुस की राजनीति इस वक्त जनहित नहीं, बल्कि गुटहित के इर्द-गिर्द घूम रही है। अगर यही हाल रहा, तो कुर्सी चाहे जिसको मिले, हार जनता और लोकतंत्र की ही होगी।




