बांदकाम विभाग की कुर्सी पर सियासी सौदेबाज़ी के आरोप
(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घुस, चंद्रपुर | घुग्घुस नगर परिषद चुनाव 20 दिसंबर 2025 को संपन्न हुए और 21 दिसंबर को परिणाम घोषित होते ही नगर की राजनीति में हलचल तेज हो गई। 22 निर्वाचित पार्षदों और विभिन्न समितियों के पदों के बंटवारे को लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर चाय की दुकानों तक चर्चाओं का बाजार गर्म है। अब इन चर्चाओं का केंद्र बिंदु बन गया है — बांदकाम (निर्माण) विभाग का सभापति पद।
सूत्रों और राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, इस अहम विभाग को पाने के लिए भाजपा, कांग्रेस, एनसीपी (अजीत पवार गट) और कुछ अपक्ष पार्षदों की भूमिका संदेह के घेरे में है। आरोप हैं कि इस पद को लेकर लाखों रुपये की बोली चल रही है। हालांकि अभी तक किसी भी दल ने इन आरोपों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां इन चर्चाओं को हवा दे रही हैं।
सवालों के घेरे में सत्ता की नैतिकता
बांदकाम विभाग नगर परिषद का सबसे प्रभावशाली विभाग माना जाता है, जहां से विकास कार्यों, ठेकों और बजट पर सीधा नियंत्रण होता है। यही कारण है कि इस कुर्सी को लेकर इतनी तीव्र खींचतान देखने को मिल रही है। सवाल यह उठता है कि क्या यह प्रतिस्पर्धा विकास की दृष्टि से है या फिर व्यक्तिगत और राजनीतिक लाभ के लिए?
जनता ने जिन प्रतिनिधियों को विश्वास के साथ चुना, क्या वे जनहित को प्राथमिकता देंगे या फिर सत्ता-समीकरण और आर्थिक लेन-देन का हिस्सा बनेंगे? यह प्रश्न आज हर जागरूक नागरिक के मन में है।
जांच एजेंसियों की भूमिका पर टिकी निगाहें
यदि वास्तव में पदों के लिए पैसों की लेन-देन की चर्चाएं सही हैं, तो यह गंभीर विषय है। ऐसे में आयकर विभाग और संबंधित खुफिया एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। क्या ये एजेंसियां केवल तमाशबीन बनी रहेंगी या फिर तथ्यों की निष्पक्ष जांच कर सच सामने लाएंगी?
जनादेश की कसौटी
घुग्घुस की जनता ने जिन उम्मीदों के साथ मतदान किया, वे उम्मीदें अब एक कठिन परीक्षा से गुजर रही हैं। यह समय है जब चुने गए प्रतिनिधियों को यह साबित करना होगा कि वे जनादेश के सच्चे प्रहरी हैं, न कि पद और पैसे की राजनीति के मोहरे।
आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि घुग्घुस नगर परिषद विकास और पारदर्शिता की मिसाल बनेगी या फिर सियासी सौदेबाज़ी का अखाड़ा।




