नियुक्ति पत्र में 15 दिन के वेतन की कटौती से लेकर यूनियन सदस्यता पर रोक तक के प्रावधान; श्रमिकों के हित, वैधानिक भुगतान और शिकायत के अधिकार पर उठे गंभीर सवाल
प्रणयकुमार बंडी
घुग्घूस, चंद्रपुर : घुग्घूस नगर परिषद में निजी एजेंसी के माध्यम से कार्यरत सुरक्षा और अन्य कर्मचारियों से संबंधित सामने आए दस्तावेजों ने ठेका पद्धति में कामगारों के अधिकारों और सेवा शर्तों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उपलब्ध दस्तावेजों में एक निजी सर्व्हिस की ओर से जारी नियुक्ति संबंधी कागजात, सेवा-शर्तें, इस्तीफा पत्र तथा ‘देणे-घेणे नसल्याबाबत’ यानी किसी प्रकार का बकाया न रहने संबंधी पत्र शामिल हैं।

इन दस्तावेजों से प्रथम दृष्टया ऐसा दिखाई देता है कि कामगार के कर्तव्यों और दंडात्मक प्रावधानों को काफी विस्तार से दर्ज किया गया है, लेकिन वैधानिक वेतन, सामाजिक सुरक्षा, शिकायत निवारण, अवकाश, सेवा समाप्ति की प्रक्रिया और श्रमिक हितों की स्पष्ट गारंटी का उल्लेख उतनी स्पष्टता से दिखाई नहीं देता। हालांकि इन दस्तावेजों के आधार पर किसी नियम को सीधे अवैध घोषित करना उचित नहीं होगा; इसके लिए नगर परिषद, संबंधित ठेकेदार तथा श्रम विभाग के रिकॉर्ड की जांच आवश्यक है।
छह महीने की ‘पर्यवेक्षीय’ अवधि और बिना नोटिस सेवा समाप्त करने का प्रावधान
नियुक्ति करार में छह महीने की पर्यवेक्षीय अवधि का उल्लेख है। इसमें यह शर्त दर्ज है कि यदि इस अवधि में कर्मचारी की सेवा एजेंसी को संतोषजनक नहीं लगी तो उसकी सेवा बिना किसी नोटिस या सूचना के समाप्त की जा सकती है।
इसके विपरीत कर्मचारी द्वारा नौकरी छोड़ने के लिए कम से कम 15 दिन पहले लिखित सूचना देना अनिवार्य बताया गया है। दस्तावेज में यह भी लिखा है कि ऐसा न करने पर 15 दिन का वेतन काटा जाएगा।

यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या ठेकेदार के लिए कर्मचारी को बिना नोटिस हटाने का अधिकार और कर्मचारी के लिए 15 दिन पहले नोटिस देने की बाध्यता समान आधार पर है? ऐसी शर्तों की वैधता और वास्तविक भुगतान व्यवस्था की जांच संबंधित श्रम कानूनों और नियुक्ति की वास्तविक प्रकृति के आधार पर की जानी चाहिए।
यूनियन सदस्यता और आंदोलन पर रोक—कामगारों के अधिकारों की जांच जरूरी
नियुक्ति शर्तों में दो प्रावधान विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करते हैं। दस्तावेज में लिखा है कि कर्मचारी किसी संप में सहभागी हुआ तो सेवा से मुक्त किया जा सकता है, और कर्मचारी को किसी संगठन की सदस्यता लेने की अनुमति नहीं होगी, अन्यथा सेवा समाप्त की जा सकती है।
यह प्रावधान श्रमिक अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पैदा करते हैं। वर्तमान में Industrial Relations Code, 2020 लागू है और उसमें ट्रेड यूनियनों से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। इसलिए किसी निजी नियुक्ति-पत्र में ऐसा प्रतिबंध होने मात्र से उसकी वैधता स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती; संबंधित शर्त को लागू कानून और परिस्थितियों के संदर्भ में जांचना आवश्यक है।
महाराष्ट्र में निजी सुरक्षा कर्मियों के लिए अलग कानूनी ढांचा
यह मामला केवल ठेकेदार और कर्मचारी के बीच निजी समझौते तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र में (Regulation of Employment and Welfare) रोजगार, सेवा शर्तों और कल्याण के लिए विशेष कानूनी व्यवस्था करता है। इस कानून में रोजगार की व्यवस्था, नियोक्ता/प्रधान नियोक्ता से संबंधित देय राशि, वेतन तथा अन्य श्रमिक हितों से जुड़े प्रावधान शामिल हैं।
इसके अलावा निजी सुरक्षा एजेंसी के संचालन के लिए धाराएं लागू है, जिसके तहत निजी एजेंसियों के लाइसेंस, पात्रता, प्रशिक्षण और नियमन की व्यवस्था है।
इसलिए नगर परिषद प्रशासन से यह सवाल पूछा जाना स्वाभाविक है कि जिस एजेंसी के माध्यम से कर्मियों की नियुक्ति की गई है, उसकी वैधानिक अनुमति, लाइसेंस, श्रम अनुपालन और कर्मचारियों को दिए जा रहे भुगतान की नियमित जांच की जाती है या नहीं?

‘GR के अनुसार भुगतान’—कागज पर भुगतान और वास्तव में हाथ में कितना?
सामने आए ‘देणे-घेणे नसल्याबाबत’ पत्र में कर्मचारी की ओर से यह लिखा गया है कि उसे शासनाच्या नियमानुसार पैसा मिळालेला आहे यानी शासन के नियमानुसार भुगतान प्राप्त हुआ है और अब कोई लेन-देन बाकी नहीं है।
लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है—किस GR/शासन निर्णय अथवा किस वैधानिक दर के अनुसार भुगतान किया गया?
यदि नगर परिषद के ठेका दस्तावेज में सुरक्षा कर्मियों के लिए निर्धारित दर, मजदूरी, सेवा शुल्क और अन्य वैधानिक देयक तय हैं, तो नगर परिषद को यह स्पष्ट करना चाहिए कि:
ठेकेदार को प्रति कर्मी कितनी राशि दी जाती है? कर्मचारी के खाते में वास्तविक रूप से कितनी राशि जमा होती है? न्यूनतम वेतन/वैधानिक वेतन की गणना किस दर से होती है? PF और ESI जैसी सामाजिक सुरक्षा का क्या प्रावधान है? वेतन पर्ची और बैंक भुगतान का रिकॉर्ड उपलब्ध है या नहीं? ठेकेदार द्वारा नगर परिषद को जमा किए गए दस्तावेजों में कर्मचारियों के भुगतान का सत्यापन कैसे किया जाता है?
वर्तमान श्रम व्यवस्था में Code on Wages से लागू किए गए हैं। सरकार ने इसे सार्वभौमिक न्यूनतम मजदूरी और वेतन संबंधी सुरक्षा से जोड़ा है।
ठेका मजदूर का वेतन सिर्फ ठेकेदार की जिम्मेदारी नहीं
Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020 में ठेका श्रमिकों के वेतन के संबंध में ठेकेदार की जिम्मेदारी निर्धारित की गई है। इसमें यह भी व्यवस्था है कि ठेकेदार द्वारा मजदूरी का भुगतान न करने या कम भुगतान करने की स्थिति में निर्धारित परिस्थितियों में Principal Employer पर भी भुगतान की जिम्मेदारी आ सकती है।
इसलिए यदि घुग्घूस नगर परिषद इन कर्मियों के लिए Principal Employer/Principal Establishment की भूमिका में आती है, तो प्रशासन को केवल यह कहकर जिम्मेदारी से अलग नहीं होना चाहिए कि कर्मचारी ठेकेदार का है। वास्तविक संविदा, लागू कानून और संबंधित श्रेणी के आधार पर जिम्मेदारी तय होगी।

नियम ठेकेदार के लिए भी हैं, सिर्फ कामगार के लिए नहीं
नियुक्ति पत्र में कर्मचारी के लिए कई निर्देश हैं—ड्यूटी पर सोने पर ₹500 तक आर्थिक दंड, निर्धारित समय से पहले छुट्टी का आवेदन, बिना अनुमति अनुपस्थिति पर कार्रवाई, नशे की स्थिति में कार्रवाई, वरिष्ठ अधिकारी से दुर्व्यवहार पर सेवा समाप्ति, स्थानांतरण आदेश का पालन, साफ-सुथरी वर्दी, दाढ़ी-कटिंग और जूते पॉलिश तक की शर्तें।
अनुशासन और सुरक्षा ड्यूटी के लिए कई शर्तें आवश्यक हो सकती हैं। लेकिन श्रमिक अनुशासन के साथ श्रमिक संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।
दस्तावेज में एजेंसी को निलंबन की कार्रवाई का व्यापक अधिकार और उसके विरुद्ध कहीं भी दाद न मांगने जैसी शर्त भी दिखाई देती है। ऐसी शर्तों की कानूनी वैधता और कर्मचारी के वैधानिक उपायों पर उनका प्रभाव विशेषज्ञ/श्रम विभाग की जांच का विषय होना चाहिए।
मानसिक दबाव का आरोप—जांच से सामने आएगा सच
यदि किसी कर्मचारी को नौकरी खोने का डर दिखाकर ऐसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए हों, या वैधानिक अधिकारों से वंचित किया गया हो, तो यह गंभीर श्रमिक शिकायत का विषय हो सकता है। लेकिन उपलब्ध कागजात अकेले यह साबित नहीं करते कि सभी कर्मचारियों के साथ मानसिक प्रताड़ना हुई है।
इसलिए संबंधित कर्मचारियों के बयान, वेतन रिकॉर्ड, ड्यूटी रजिस्टर, उपस्थिति पत्रक, बैंक स्टेटमेंट, PF/ESI रिकॉर्ड, शिकायत रजिस्टर और ठेका अनुबंध की जांच आवश्यक होगी।

नगर परिषद से उठते हैं ये सीधे सवाल
- घुग्घूस नगर परिषद ने ठेका किस प्रक्रिया और निविदा के माध्यम से दिया?
- संबंधित एजेंसी का लाइसेंस वैध है या नहीं?
- ठेका अनुबंध में कर्मियों के लिए निर्धारित वेतन/मजदूरी कितनी है?
- नगर परिषद ठेकेदार द्वारा कर्मचारियों को किए गए भुगतान का मासिक सत्यापन करती है या नहीं?
- PF, ESI और अन्य वैधानिक देयकों का भुगतान नियमित है या नहीं?
- कर्मचारियों से 15 दिन के वेतन की कटौती किस कानूनी/संविदात्मक प्रावधान के आधार पर की जाती है?
- ₹500 दंड सहित अन्य आर्थिक दंड की शर्त किस नियम या अनुबंध के आधार पर है?
- यूनियन सदस्यता और हड़ताल/संप से संबंधित शर्तों की कानूनी जांच किस अधिकारी ने की?
- सेवा समाप्ति के खिलाफ कर्मचारी को शिकायत/अपील की कौन-सी व्यवस्था उपलब्ध है?
- ‘शासनाच्या नियमानुसार पैसा मिळालेला आहे’ कहकर हस्ताक्षर करवाए जाने वाले पत्र में किस GR अथवा सरकारी दर का आधार है?
- क्या नगर परिषद ने पिछले एक वर्ष में ठेका सुरक्षा कर्मचारियों के वेतन और वैधानिक भुगतान का कोई स्वतंत्र ऑडिट कराया है?
कामगार से हर शर्त मनवाना आसान, लेकिन उसके अधिकार सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी
सामने आए दस्तावेज एक व्यापक बहस को जन्म देते हैं—क्या ठेका व्यवस्था का उद्देश्य केवल कम लागत में सेवा लेना है, या उसके साथ कामगारों के वैधानिक अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है?
नगर परिषद को ठेकेदार से यह सुनिश्चित कराना चाहिए कि निविदा में निर्धारित शर्तों के साथ-साथ लागू श्रम कानूनों का पालन भी हो। दूसरी ओर, ठेकेदार को भी स्पष्ट करना चाहिए कि नियुक्ति पत्र की प्रत्येक शर्त किस कानूनी/संविदात्मक आधार पर बनाई गई है।
क्योंकि सवाल केवल एक की नौकरी का नहीं है। सवाल यह है कि सार्वजनिक संस्था की ठेका व्यवस्था में काम करने वाले कर्मचारी के लिए नियम कितने कठोर हैं और उसके अधिकार कितने सुरक्षित।
घुग्घूस नगर परिषद प्रशासन, संबंधित एजेंसी और श्रम विभाग से दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करने की अपेक्षा है। संबंधित पक्षों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।





