Thursday, June 11, 2026

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नदी में मौत के बाद परिवार बेसहारा क्यों? घुग्घुस में उठी स्थायी मुआवजा नीति की मांग

प्रणयकुमार बंडी

घुग्घुस, चंद्रपुर : वर्धा नदी में हाल ही में हुई दर्दनाक घटनाओं ने पूरे घुग्घुस शहर को झकझोर कर रख दिया है। नदी में डूबने, आत्महत्या, दुर्घटना अथवा अन्य कारणों से होने वाली मौतों के बाद सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि मृतक के परिवार का भविष्य कौन संभालेगा? परिवार का सहारा छिन जाने के बाद आर्थिक, मानसिक और सामाजिक संकट का सामना करने वाले परिजनों की मदद के लिए क्या शासन के पास कोई प्रभावी और स्थायी व्यवस्था है?

इन्हीं सवालों के बीच घुग्घुस में एक गंभीर जनचर्चा शुरू हो गई है। नागरिकों का कहना है कि नदी में किसी भी कारण से मौत होने पर मृतक के परिवार को केवल संवेदना नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए। चाहे मृतक सरकारी कर्मचारी हो, निजी कंपनी में कार्यरत हो, अस्थायी मजदूर हो, विद्यार्थी हो, बेरोजगार युवक हो, वृद्ध हो या फिर कोई मासूम बच्चा, प्रत्येक परिवार को समान रूप से सहायता मिलनी चाहिए।

स्थानीय नागरिकों का मानना है कि शासन को ऐसी व्यापक नीति बनानी चाहिए, जिसके तहत मृतक की आयु और संभावित कार्यकाल को ध्यान में रखते हुए न्यूनतम 60 वर्षों के मजदूरी मानक के आधार पर मुआवजा अथवा विशेष सहायता पैकेज दिया जाए। साथ ही परिवार के लिए विशेष डेथ इंश्योरेंस, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा तथा पुनर्वास की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

लोगों का सवाल है कि जब विभिन्न योजनाओं के माध्यम से अनेक क्षेत्रों में राहत और सहायता दी जाती है, तो नदी में जान गंवाने वाले नागरिकों के परिवारों के लिए अलग और प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकती? हर हादसे के बाद प्रशासनिक बैठकें, जांच और आश्वासन तो दिए जाते हैं, लेकिन पीड़ित परिवारों के जीवनभर के संघर्ष का समाधान कौन करेगा?

नागरिकों की मांग है कि जिला प्रशासन, कलेक्टर कार्यालय, तहसील प्रशासन, नगर परिषद, जल संसाधन विभाग, जल संरक्षण विभाग तथा क्षेत्र में कार्यरत बड़ी औद्योगिक कंपनियां मिलकर एक स्थायी राहत कोष का निर्माण करें। इस कोष के माध्यम से किसी भी नदी दुर्घटना या जलजनित हादसे में मृत व्यक्ति के परिवार को तत्काल और दीर्घकालीन सहायता प्रदान की जा सके।

विशेषज्ञों का भी मानना है कि किसी परिवार के कमाऊ सदस्य की मौत केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार के आर्थिक ढांचे को तोड़ देती है। इसके परिणामस्वरूप मानसिक तनाव, बच्चों की पढ़ाई पर असर, कर्ज का बोझ और सामाजिक असुरक्षा जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो जाती हैं।

घुग्घुस में उठ रही यह मांग अब केवल एक स्थानीय चर्चा नहीं रही, बल्कि जनहित से जुड़ा बड़ा प्रश्न बनती जा रही है। सवाल यह है कि क्या शासन-प्रशासन इस पीड़ा को समझते हुए कोई ठोस और दीर्घकालिक नीति बनाएगा, या फिर हर हादसे के बाद कुछ दिनों की संवेदना और औपचारिक घोषणाओं तक ही सीमित रहेगा?

फिलहाल पूरे घुग्घुस की निगाहें शासन और प्रशासन की ओर टिकी हैं। लोग इंतजार कर रहे हैं कि नदी में जान गंवाने वालों के परिवारों को सम्मानजनक जीवन देने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाएगा या नहीं। क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल विकास परियोजनाओं से नहीं, बल्कि संकट में अपने नागरिकों के साथ खड़े होने से होती है।

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Pranaykumar Bandi

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